श्री वीर सुदर्शन हनुमान मंदिर, आधनुर
तालुका पापानसम, जिला जथंजावुर, तमिल नाडु

जी के कोशिक

 

जी के कोशिक

थिरु आधनुर दिव्य क्षेत्र
आधनुर, स्वामीमलाई के पास एक छोटा सा गांव है। इस क्षेत्र का दिव्य मंदिर धान के खेतों से घिरा हुआ है। यह आंखों को मनोहर लगता है, तथा इस मंदिर में पुजा-अर्चना से या देवता का ध्यान करने से भक्तों को एक नया अनुभव होता है।


आदिरङ्केश्वरं वन्ते पाटलि वन समस्तितं
अग्नि, ब्रुगु, कामधेनुब्यो तत्ताबीतं धयान्तिरम्
विमाने प्रणवे रङ्क नायक्या सु स माचरितं सुर्य
पुष्कर्नी दीरे शेषस्योपरि सायिनम्


उपरोक्त श्लोक आधनुर की दिव्य कथा सुनाते हैं। इसमें पहले बताया है कि यह जगह "आदि रामेश्वरम" है, जिसका अर्थ है कि आधनुर, त्रिची के पास श्रीरंगम से भी अधिक पुराना है।


मंदिर के दिव्य चरित्र की कथा ब्रह्माण्ड पुराण में भी वर्णित है। "आ" का मतलब गाय होता है। चूंकि इस स्थान पर कामधेनु [पवित्र गाय] ने भगवान विष्णु पर ध्यान लगाया था और इसलिए इस जगह का नाम "आ + ध + नुर" - आधनुर प्रचलित हो गया है। किवदंती है कि भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु और महालक्ष्मी द्वारा दी हुई माला, इंद्र को दी थी। इंद्र ने माला की पवित्रता जाने बिना, अपने ऐरावत हाथी को पहना दी थी। ऐरावत ने माला को बाहर निकाला और फेंक दिया था। भृगु बाबा को इस पर गुस्सा आ गया और इंद्र को शाप दे दिया। जब इंद्र ने भगवान विष्णु को अपने अभिनय के लिए पश्चाताप का आग्रह किया, तो श्री महालक्ष्मी ने कहा कि अभिशाप से छुटकारा मिल जाएगा, जब इंद्र भृगु ऋषि की बेटी "भार्गवी" के रूप में भगवान विष्णु से शादी करेगा। इस क्षेत्र के भगवान विष्णु ने इंद्र को दर्शन दिया था और उसे अभिशाप से छुटकारा मिल गया था। श्री अग्नि भगवान भी एक पाप के कारण पीड़ित थे, उन्हें भी इस क्षेत्र के प्रभु दर्शन पाकर पापों से छुटकारा मिल गया था। भृगु ऋषि ने ही इस क्षेत्र के देवता की स्थापना की थी।


इस मंदिर का विमान 'प्रणव विमान' है। इस क्षेत्र के भगवान "आडुलक्कुम अय्यन" हैं। और वो आदिशेषनाग पर झुके हुये दिखाई देतें हैं, उअनके साथ थयर भार्गवी, मंदिरा पीदेस्वरी, कमला वासिनी, रंगानायकी हैं। पुन्नै और पातली क्षेत्रीय पौधे हैं, तथा तीर्थ, सुर्य-तीर्थ है।


नाम "आंडु अलक्कुम अय्यन"
श्री वीर सुदर्शन हनुमान मंदिर, अधनुर,तमिल नाडु इस क्षेत्र में भगवान को "आंडु अलक्कम अय्यन" के नाम से जाना जाता है। यहाँ भगवान झुकी हुई मुद्रा में, परिमाण जार का तकिया लगाये, हाथ में ताड़ का पत्ता एवं लेखनी के साथ देखाई देतें हैं। इसकी भी एक रोचक कथा है, कि भगवान को यह नाम कैसे मिला और क्यों इस अंग-विन्यास में हैं?

तिरूमंगै आळवार बारह आळवार से एक है। जिन्होंने भगवान विष्णु की स्तुति में भजन गाये थे। तिरूमंगै आळवार ने श्रीरंगम मंदिर की मरम्मत करवाई थी। श्रीरंगम मंदिर के जीर्णोद्धार के दौरान उनके सभी पैसे खत्म हो गये थे। उनके पास श्रमिकों की मजदूरी का भुगतान करने के लिए पैसे की कमी थी। उन्होंने पैसों के लिए भगवान से प्रार्थना की। भगवान ने उन्हें कोल्लिडम के तट पर एक जगह पर जाने का निर्देश दिया। आळवार को वहाँ एक व्यापारी पगड़ी पहने हुये, हाथ में नापने हेतू कटोरा, ताड़ का पत्ता और लेखनी लिये हुये मिला।


व्यापारी ने आळवार को बताया कि भगवान रंगनाथ ने आळवार की मदद करने के लिए भेजा है, तथा उससे उसकी जरूरत पूछी। तिरूमंगै ने श्रमिकों को मजदूरी का भुगतान पैसों में करने की आवश्यकता के बारे में बताया। व्यापारी ने कहा कि उसके पास कोई पैसा नहीं है, परन्तु उसके पास मरक्काल [मापने बर्तन / कटोरा] है, जोकि उनकी जरूरत को पूरा कर देगा। उसने बताया कि वो


इस कटोरे में रेत नापकर, मजदूरी के रूप में दे सकता है। ईमानदार श्रमिकों के लिए मजदूरी, रेत से सोने में बदल जायेगी, और निष्ठाहीन श्रमिकों के लिए यह केवल रेत ही रहेगी। आळवार ने इस शर्त को स्वीकार कर लिया। कई श्रमिकों को उनकी मजदूरी में रेत ही मिली। श्रमिकों का मानना था, कि व्यापारी एक जादूगर था, और उस पर हमला करना शुरू कर दिया। प्रभु जो व्यापारी के भेष में थे, आळवार को दर्शन देने का निश्चय किया और वहाँ से भागने लगे, तिरूमंगै आळवार ने उनका पीछा किया। व्यापारी इस जगह पर रूके, तथा व्यापारी के रूप में भगवान ने ताड़ का पत्ता और लेखनी के साथ अपने असली रूप में आकर, इसी जगह आळवार को दर्शन दिये थे।


चूंकि भगवान ने ईमानदारी के अनुसार सही माप में उपकार किया था, इसीलिये इस क्षेत्र के भगवान को "आंडु अलक्कम अय्यन" पुकारा जाता है।


आधनुर और श्रीरंगम की समानता
ये दोनों क्षेत्र कावेरी नदी और छुल्लुम नदी के बीच स्थित हैं।


शास्त्रों के अनुसार, वहाँ वैकुंठ में दो खंभे हैं, जिनमें भगवान विष्णु का वास है। उपर चढ़ते हुये इन खंभों के प्रेमालिंगन से, जीव अपने पापों से मुक्त हो जाता है। इस मंदिर में अर्द्ध मंडप में इस तरह के दो स्तंभ हैं। भक्तगण स्तंभों की सम संख्या में ही परिक्रमा करतें हैं, तथा मोक्ष प्राप्त करने के लिए भगवान के सिर और पैरों की पूजा-अर्चना की जाती है। भारत के सभी दिव्य क्षेत्रों में, यह दो मनथून केवल श्रीरंगम और आधनुर क्षेत्र में ही हैं।


इस मंदिर में भी श्रीरंगम की तरह सात दीवारें हैं।


कावेरी नदी में बाढ़
एक बार कावेरी में बाढ़ आई थी, और इस जगह के पास के क्षेत्र बह गये थे।

अन्य दिव्य क्षेत्र झकथ रक्षक पेरूमल मंदिर या थिरूकोविलुर या आदुथुरै पेरूमल मंदिर भी इस बाढ़ से प्रभावित था और इसका मदुरै की रानी मंगम्मा द्वारा पुर्ननिर्माण करवाया था।


उसी तरह यह दिव्य क्षेत्र भी, यह कहा जाता है कि कश्मीर के राजा द्वारा बनाया गया था। चूंकि यह कहा जाता है कि इस मंदिर में भी सात थिरूमथिल था यह संभव है कि आसपास का क्षेत्र भी, उस समय 'कावेरी की बाढ़' से प्रभावित रहा हो। अत: अब यह मंदिर धान के खेतों से घिरा हुआ देखाई देता है। लेकिन वहाँ एक और मंदिर अलग-थलग है, जोकि आसपास धान के खेतों के बीच अकेले इस मंदिर से अलग स्थित है।


धान के खेत के बीच मंदिर
मंदिर दिव्य क्षेत्र के उत्तर-पूर्व दिशा में है और सिर्फ एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित है। पूर्वोमुखी मंदिर आकार में बहुत छोटा है। यह श्री हनुमान का मंदिर है। वहाँ "आडुलक्कुम अय्यन" मंदिर के आस-पास कोई अन्य मंदिर नहीं है। यहाँ यह संदेह उठता है, कि ये मंदिर सात तिरुमथिल "आडुलक्कुम अय्यन" मंदिर का एक हिस्सा होना चाहिए था। हालांकि यह मंदिर, "आडुलक्कुम अय्यन" मंदिर का हिस्सा अभी भी है।

हनुमान मंदिर, आधनुर
श्री वीर सुदर्शन हनुमान मंदिर, आधनुर, तमिल नाडु एक साधारण से, दस फीट चौड़े और बीस फुट लंबे कमरे में ही मंदिर है। मंदिर की इमारत सड़क से लगी हुई है। वहाँ कमरे के बाहर एक पत्थर सटा हुआ है, जिस पर श्री राम के पदचिन्हों की छाप है। यहाँ मंदिर में प्रवेश करने से पहले, भक्तगण श्री राम की पुजा-अर्चना करते हैं। कमरा दो भागों में बँटा हुआ है। एक सामने की ओर है, जोकि भक्तों को खड़ा होने के लिए है। तथा अन्य जहां देवता के लिये गर्भग्रह है।

श्री वीर सुदर्शन हनुमान
श्री वीर सुदर्शन हनुमान, अधनुर,तमिल नाडु श्री हनुमान पूर्वोमुखी हैं, और उत्तर दिशा की ओर चलते हुये दिखाई पड़ते हैं। देवता की मूर्ति सात फुट ऊँची है, जोकि एक पूर्ण कलाकृति है। भक्तगण प्रभु को देखते ही मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। पहली बात जो ध्यान आकर्षित करती है, वो प्रभु की पूंछ, जोकि सिर के ऊपर कुंडली रूप में दिखाई देती है। कुंडली के केंद्र में एक चक्र बारह पंखुड़ी के साथ दिखाई देता है। भगवान ने एक आभूषण "रक्कोति" - सिर पर बड़े करीने से केशों में बँधा, चोटी में पहना हुआ है। कानों में लंबे कुंडल जो कंधे को छू रहें हैं। प्रभु की आँखें भक्तों को आशीर्वाद बरसा रही हैं। प्रभु का उपर उठा हुआ दाहिना हाथ, भक्तों को अभय प्रदान करता है। इन सब के साथ श्री हनुमान, आंखों को लुभाते हैं। इस क्षेत्र में भगवान के माधुर्य को देखते ही भक्तगण अपनी सुध-बुध खो देतें हैं। इस क्षेत्र के प्रभु को "सुदर्शन" कहते हैं, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि "सुदर्शन" = "सु + दर्शन" अर्थात जिसका दर्शन भक्तों के लिये शुभ हो।



|| सीतापति रामचन्द्र की जै। पवन सुत हनुमान कि जै। ||



अनुभव
आधनुर के इस पवित्र पावन क्षेत्र में, श्री वीर सुदर्शन हनुमान के दर्शन मात्र से, आपकी सभी चिन्ताएँ एवं संताप मिट जायेंगे ॥

 

 

 

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

 

ed : may 2016