श्री वीर हनुमान मंदिर चेंगलपेट
तमिल नाडु

जी के कोशिक

 

चेंगलपेट पेरूमल मंदिर
जब आप श्री कोदंड रामास्वामी के सुंदर मंदिर में पहुँचते हैं, तो आप शांत वातावरण और पृष्ठभूमि में पहाड़ों की हरियाली से घिरा हुआ पाते हैं। ऐसा महसूस होता है कि आप चेंगलपेट शहर में नहीं हैं, अपितु स्वर्ग में आ गये हों। हालांकि मंदिर का नाम श्री कोदंड रामास्वामी मंदिर है, "वैदेही साहित्य" के श्लोकानुसार श्री रामास्वामी मंदिर के मुख्य देवता का दाहिना हाथ ज्ञान मुद्रा में अपनी पत्नी श्री वैदेही के साथ वीरासन में एक ऊंचे सिंहासन पर विराजमान हैं। अनुज श्री लक्ष्मण उनके दांई तरफ खड़ें हैं, वहीं अन्य अनुज भरत और शत्रुघ्न, श्री प्रपंजना सुत उपनाम श्री हनुमान अंजली हस्ता के साथ सामने बैठे हैं। शांत वातावरण में श्री राम, श्री हनुमान को ज्ञानोपदेश दे रहे हैं, बड़ा ही मनोहर दर्शय है। और प्रभु का यही वास्तविक लावण्य मंत्रमुग्ध कर देता है। हालांकि यहाँ पर 'उत्सव मूर्ति' कोदंड राम की है।


श्री वरधराजा स्वामी द्रव्यागार
श्री राम चबूतरे के बाईं ओर श्री वरधराज, जो इस मंदिर के इष्टदेव की पवित्र द्रव्यागार है। यहाँ श्री वरधराज दक्षिणोमुखी हैं, दाहिने हाथ में प्रयोग मुद्रा में सुदर्शन चक्र है। यहाँ श्री पेरूंदेवी के लिए एक अलग थयर द्रव्यागार है। श्री वरधराजा की उत्सव मूर्ति माता श्री श्री देवी और श्री बूमा देवी के साथ है। १०४१ ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण हुआ था, तथा यह लोकप्रिय नाम पेरूमल मंदिर से जाना जाता है।


श्री थिमम राजा जमींदार ने मंदिर का स्थानांतरण १७६८ में
उस समय चेंगलपेट के किला-क्षेत्र में भगवान श्री पट्टाभिराम के लिए एक मंदिर था। तब वहाँ दूसरों के द्वारा सनातन धर्म मंदिरों पर आक्रमण होता था, श्री थिममा राजा जमींदार स्थानीय मुखिया ने वर्ष १७६८ में भगवान श्री पट्टाभिराम मंदिर का स्थानांतरण, श्री वरदराज स्वामी मंदिर परिसर में करवा दिया था। श्री थिम्म राजा जमींदार श्री चेंगलवरायन के पिता थे। जिनके नाम पर इस जगह का नाम चेंगलपेट हो गया था। भगवान के शृंगार में एक आभूषण १८८७ में एच.एम. महारानी विक्टोरिया के स्वर्ण जयंती समारोह के अवसर पर भेंट किया गया था।


श्री हनुमानजी का चबूतरा
वीर हनुमानजी के लिये परिसर के उत्तर-पश्चिम कोने में एक अलग स्थान है, वास्तु शास्त्र के अनुसार यह कोना वायु प्रधान होता है। भगवान हनुमान यहां एक अनोखी मुद्रा में हैं। हनुमानजी का एक हाथ अभय मुद्रा में और दूसरे हाथ में एक बड़ा कमल लिये हुये कूल्हे पर रखा हुआ है। उनकी पूंछ उपर उठी हुई है, और एक छोटी सी घंटी पूंछ के अंत में बँधी है। जैसे काल संहार-मूर्ति थिरूकतैयुर में, रूद्र ने काल को भूमि पर दबोचा था, ठीक उसी तरह हनुमान ने श्री शनिच्चर को भूमि पर जकड़ा हुआ है।


किंवदंती:

श्री शनिचर और श्री हनुमान

हनुमानजी के इस विशेष रूप के पीछे की कहानी इस तरह है:-


जब हनुमान लंका के लिए पहाड़ महेंद्र की चोटी से छलांग लगाने के लिये तैयार खड़े थे, भगवान सूर्य के बेटे शनिचरजी हनुमानजी के पास आये और कहा कि शनी की साढ़े साती उन पर शुरू हो गई है। इस पर हनुमानजी ने बताया कि वो रघुवंशी (सुर्यवंशी) श्री राम के विशेष कार्य पर लंका जा रहे हैं। सूर्यपुत्र के रूप में शनिचर को अभी कुछ समय के लिये छोड़ देना चाहिये, और वापस लोटने पर वो खुद शनिचर को समर्पण कर देंगे। प्रस्ताव पर सहमति हुई है, और शनिचर महेंद्र पहाड़ पर उनका इंतजार करने लगे।


लेकिन श्री राम सहायतार्थ, एवं श्री सीता को वापस लाने के कार्य को पूर्ण करने के उत्साह में, हनुमानजी ने शनिचर को किया वादा भुला दिया। हांलाकि हनुमानजी श्रीलंका के लिए समुद्र पर पुल-निर्माण हेतु अपने सिर पर बहुत सारे पत्थर ढ़ोहकर मदद कर रहे थे। उसी समय शनिचर निर्माण-स्थल पर आये और हनुमानजी को वादा याद दिलाया और उनसे पूछा कि शरीर के किस हिस्से में लगूँ। फिर हनुमान ने कुछ समय और छोड़ने के लिए आग्रह किया। लेकिन कर्तव्य-परायण शनिचर ने बताया कि अब कर्तव्य-परायणवश उन्हें कोई छूट नहीं मिल सकती। हनुमानजी ने थोड़ी देर सोचा और शनिचर को सुझाव दिया, कि वो अपने कर्तव्य निर्वाहन के दौरान, राम की सहायता हेतु वह कुछ श्रम कर सकतें हैं। जैसा कि वहाँ पर एक छोटी सी गिलहरी अपने सामर्थ्यानुसार श्रम कर रही थी। शनिचर ने पूछा कि वो कैसे वह राम की सहायता कर सकतें हैं, इस पर हनुमानजी ने कहा, "अपने सिर पर कुछ पत्थर लेकर मेरे सिर पर रखे पत्थरों पर बैठ जाओ। वादानुसार राम की सहायता हेतु, कर्तव्य-परायण शनिचर इस पर सहमत हो गये। उन्होंने अपने सिर पर कुछ पत्थर रखें और हनुमानजी के सिर पर बैठ गये। अब वो हनुमानजी के सिर पर रखें पत्थरों और अपने सिर पर रखे पत्थरों के बीच भींच गये।


श्री हनुमान का श्री शनिचर को नत्थी करना
जब तक हनुमानजी इस विशेष कार्य में व्यस्त थे, हनुमान ने भगवान राम की प्रशंसा में नाचते हुए गीत गाये थे। हर बार उनके कूदने से, पत्थर भी उछलते थे और उससे शनिचर पत्थरों के बीच में दब रहे थे। उछलते पत्थरों द्वारा दी गई असहनीय यातना से शनिचर व्याकुल थे। उन्होंने हनुमान से अनुरोध किया कि उन्हें इस कार्य से मुक्ति दें। और विनती की वो हनुमानजी के सिर के बजाय पैरों में रहना चाहेंगे। लेकिन हनुमानजी सेतु बंधन के लिए पत्थर ढोने में व्यस्त थे, और शनिचर के इस अनुरोध पर ध्यान नहीं दिया। तभी शनिचर का शोर सुनकर, भगवान राम ने हस्तक्षेप किया और हनुमान को बताया कि इस विषय पर एक विचारशील दृष्टिकोण रखें। हनुमानजी ने तब शनिचर को अपने सिर से मुक्त किया, लेकिन शनिचर को पैरों में लिपटाने से पहले, जमीन पर दबोचा।


पुन: शनिचर ने निम्नलिखित शब्दों में श्री राम को हनुमान से छुटकारा दिलाने के लिये अनुरोध किया।


यो वक्थिराम तो नाम मारुथे: अबिवा स्वयम् |
क्षणम् तत्र न दृष्टेयं सत्यं प्रति शृणोमिते ||


हे राम, जो क्षणिक भी, आपका या हनुमानजी का नामोच्चारण करेगा, मैं उनको नहीं त्रासुगाँ। इन्हीं शब्दों के साथ शनि भगवान अपने लोक को चले गये।


इस मंदिर की वीर हनुमान मूर्ति, हनुमानजी के इसी जीवनक्रम को दर्शाती है।

 

|| सीतापति रामचन्द्र की जै। पवन सुत हनुमान कि जै। ||



अनुभव
भगवान हनुमान ही तारक हैं, भक्तों में अटल विशवास है। प्रभु प्रार्थना से हम सभी संकटो से मुक्ति पा सकतें हैं, और इसीलिये प्रभु संकटमोचन कहलाते हैं।

 

 

 

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

 

ed : August 2016