वीर हनुमान मन्दिर, मैलापूर, चैन्नई, तमिलनाडु

जी के कोशिक

 

मद्रास शहर
जिन लोगो ने मद्रास शहर देखा है जोकि अब चैन्नई नाम से जाना जाता है । उन्होंने महान एवं भव्य कपिलेश्वर मन्दिर मैलापूर जरुर देखा होगा। तेजस्वी राजा गोपुराम सदा हमें याद रहेंगे, क्योंकि हम मन्दिर के अन्दर पागल कर देने वाली भीड़ और परेशान करने वाले शहर से बहुत दूर होंगे। श्री ठिरुग्यन शम्पनथर महान संतो में एक थे। जिन्होंने भगवान शिव की प्रशंसा में एक भजन लिखा था। श्री ठिरुग्यन शम्पनथर भगवान कपलिस्वरर की प्रशंसा में एक भजन लिखा था। इसीलिये यह माना जाता है कि यह मन्दिर काफी समय से अस्तित्व में है।


संत कवि ठिरुवल्लुवर जिन्होंने ठिरु खुरल लिखा वो मैलापूर में पैदा हुए थे। वहां संत जी का एक मन्दिर भी है यह स्थान शहर का प्राचीन स्थानों में से एक है। ठिरुवेत्रिउऊर चैन्नई पत्तनम का उतरी भाग है और दक्षिण दिशा में ठिरुवन्मिउऊर है। चैन्नई पत्तनम का मध्य भाग मैलापूर और ठिरुवल्लिकीनि है।


ठन्नीर थुरै अंजनेया स्वामी मन्दिर
ठिरुवल्लुवर मन्दिर के पास एक प्रसिद्ध अंजनेया स्वामी मन्दिर है। भगवान अंजनेया स्वामी मन्दिर मैलापूर में संस्क्रत कालेज के पास प्राचीन मन्दिरों में से एक है। यह मन्दिर १९४०-१९५० के दशकों में थन्नीर थुरै अंजनेयर कोइल के नाम से आम तौर पर जाना जाता था। यह मन्दिर थन्नीर थुरै सब्जी बाजार के पास स्थित है। उन दिनों सारे चैन्नई में बहुत कम केवल अंजनेयर मन्दिर थे। आजकल यह मन्दिर ळज अंजनेयर कहलाता है, क्योंकि मैलापूर में ही तीन अंजनेयर मन्दिर हैं।


मैलापूर अंजनेया मन्दिर कई तरह से न्यारावीर हनुमान मन्दिर, मैलापूर, चैन्नई, तमिलनाडु
इस मन्दिर के भगवान अंजनेया स्वामी कई तरह से न्यारे हैं। कई पंडितों ने, जैसे श्री आनन्थराम डीक्शिथर श्री करिपनन्थ वारियर ने रामायण पर इस मन्दिर के पास संस्क्रत कालेज में प्रवचन दिये हैं। जहाँ-जहाँ रामायण का गुणगान होता है वहाँ-वहाँ भगवान अंजनेया स्वामी उपस्थित रहतें हैंइन प्रवचनों के बाद से काफी रामभक्तों ने इस मन्दिर में आना प्रारम्भ कर दिया है संस्क्रत कालेज कई वेदिक गतिविधियों, हिन्दु धर्म पर दार्शनिक वाद-विवाद तथा यह पुराणों और इतिहासों पर प्रवचनों का स्थान था।


श्री कांची कामाकोटि पीठाधीक्ष्वर जगत गुरु श्री परमचार्या चर्तु-मास के लिये संस्क्रत कालेज शिविर में रह रहे थे। और चन्द्र मौलिसीस्वरा पुजा कर रहे थे। बहुत दिनों संध्या पुजा के बाद श्री परमचार्या ने भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत किया। धर्म के बारे में भक्तों को इन प्रवचनों में स्पष्टिकरण प्रदान किये। लोगों की अस्पष्ट अवधारणा को अध्यापन से स्पष्ट किया (आम आदमी के लिये ये अवधारणायें रहस्मय किनारा होतीं हैं)। इस मन्दिर के भगवान अंजनेया स्वामी ने संस्क्रत कालेज में इन सारी गतिविधियों एवं उत्सवों का साक्षात्कार किया है।


श्री राजाजी की रामायण
श्री चक्रवर्ती राजागोपालाचारी, भारत के पहले गवर्नर जनरल, आम तौर पर राजाजी नाम से जाने जाते हैं, ने रामायण को तमिल भाषा में, "चक्रवर्ती ठिरुमगन" (महान महाराजा का पुत्र) के नाम से सम्पादित किया। इसे तमिल सप्ताहिक कल्कि में धारावाहिक प्रकाशित करने से पहले, श्री अंजनेया का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिये राजाजी ने "चक्रवर्ती ठिरुमगन" पांडुलिपि को इस मन्दिर में रखा।


स्वामी शिल्पा
भगवान अंजनेया स्वामी का पुण्य स्थल अर्ध-शिल्पी रुप पश्चिम दिशा की तरफ देखते हुए है और देखने में लगता है कि कानों में कुडंल पहने और आखों में तेजिस्वता लिये हुए दक्षिण दिशा की और जा रहे हैं। उनका सीधा हाथ अभय मुद्रा में, बाएँ हाथ कुल्हे पर गद्दा लिये हुए हैं। उनकी भुजाओं में बाजूबंद और कलाई पर ठोस कंगन हैं। उनके चरण कमलों में पायल है, उनकी पूछँ सिर से ऊपर दक्षिण दिशा को संकेत किये हुए है। श्री लक्ष्मी जी एवं श्री सरस्वती जी की तरह, भगवान कमलासन पर विराजित हैं।


भगवान अंजनेया सन्निधि में अंजनेया स्वामी और पंचलोक वेनुगोपला स्वामी की उत्सवमूर्तियाँ देख सकते हैं। भगवान अंजनेया सन्निधि के दाँई हाथ की तरफ पेरुमल कोथन्दा राम सन्निधि १९५४ में बना, जिसमें श्री राम, देवीश्री सीता एंव अनुज लक्ष्मण विराजित हैं।


आलेख / दंत-कथा
ये कहा जाता है कि, तीन सौ साल पहले, मैसूर के व्यापारिक सम्प्रदाय ने (जिन्हें शेट्टी कहते हैं), युसुफ खान के पड़ताड़ित करने पर, अपने घर छोड़ दिये थे और वो चैन्नई आकर मैलापूर में जहाँ कुम्हारों के भट्टे थे वहाँ बस गये और उस स्थान को कयापेट्टै या कोसापेट्टै से जाना जाता है। उन्होंने कयापेट्टै में हनुमानथरया शिल्पम स्थापित किया जो वो अपने साथ मैसूर से लाये थे। तदुपरान्त ये व्यापारिक सम्प्रदाय तमिलनाडु के व्यापारिक सम्प्रदाय साथ मिल गया और अपनी पहचान शेट्टिआरस प्राप्त कर ली।


यह मन्दिर छोटा सा था, भगवान अंजनेया स्वामी के दर्शन मेन रोड से ही हो जाते हैं। अभी हाल में ही राजागोपुराम का निर्माण हुआ और मन्दिर को भक्तों एवं प्रबंधन ने बडा तथा भव्य बनाया ये प्रचलित है कि हर साल पहली जनवरी को, पांच सौ से ज्यादा भगवान को वदा मलाई प्रदान होती है।

 

 

 

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥