श्री हनुमान, देवप्रयाग
टेहरी गढ़वाल, उत्तराखंड

जी के कौशिक

 

देवप्रयाग, टेहरी गढ़वाल, उत्तराखंड


देवप्रयाग
संस्कृत में "देवप्रयाग" का मतलब "भक्ति संगम" या "धार्मिक संगम" होता है। हमारे शास्त्रों के अनुसार, देवप्रयाग दो पवित्र नदियों, अलकनंदा और भागीरथी का संगम स्थल है, वास्तव में देवप्रयाग से ही नदी का नाम गंगा हो जाता है, जोकि भारत के उत्तरी भाग में बहती हुई, बंगाल की खाड़ी में "गंगा सागर" पर मिल जाती है। देवप्रयाग हिमालय क्षेत्र में पांच पवित्र संगम में से एक है, तथा हिंदु भक्तों का एक महत्वपूर्ण तीर्थ-स्थल है।


उत्तराखंड के दिव्य स्थल
श्री रघुनाथजी मंदिर, देवप्रयाग, टेहरी गढ़वाल, उत्तराखंड भगवान विष्णु के बारह आळ्वार सर्वोच्च भक्त हैं जिन्होंने वैष्णवपंथ को लोक-प्रिय किया था। इन आळ्वार द्वारा भगवान विष्णु पर भजनों के रूप में भक्ति का उद्गार "दिव्य देश" [दिव्य परमधाम] प्रचलित है। उनके गीतों में आदरणीय 108 क्षेत्र सम्मानित हैं। जिनको दिव्य तीर्थ-स्थल के रुप में वर्गीकृत किया गया था। उत्तराखंड राज्य में, तीन दिव्य तीर्थ-स्थल हैं, और वो बद्रीनाथ (जोशी मठ या तिरुप्पिरुदी) नंदप्रयाग, और देवप्रयाग (तिरुक्कण्डाम या कादीनगर) प्रचलित नामो से जाने जाते हैं।


श्री रघुनाथजी मंदिर
देवप्रयाग गिद्धांचल पर्वत, दशरथांचल पर्वत, और नरसिंहाचल पर्वत नामक तीन चोटियों से घिरा हुआ है। गिद्धांचल पर्वत रघुनाथ मंदिर के ऊपर है। और नरसिंहाचल पर्वत पर श्री रघुनाथ मंदिर स्थित है और दशरथांचल पर्वत "संगम" के दाईं तरफ है।


देवप्रयाग एक छोटा सा गांव है, और मुख्य रूप से यहाँ के परिवारजन बद्रीनाथ में पूजा-अर्चना करते हैं। जब बद्रीनाथ मंदिर सर्दियों के दौरान बंद कर दिया जाता है, तो पुरोहितगण रहने के लिए यहां आ जाते हैं। श्री आदि शंकराचार्य इन पुरोहितों को बद्रीनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए दक्षिण से लाये थे। इस गांव में ये परिवार श्रीरघुनाथ मंदिर के पास रहते हैं।


टिहरी के महाराजा ने श्रीरघुनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था। श्रीरघुनाथ मंदिर १८०३ में एक भूकंप से क्षतिग्रस्त हो गया था, जिसको पुनर्निर्मित किया गया था। वर्तमान मंदिर दौलत राव सिंधिया ने पुर्ननिर्माण करवाया था।


भगवान विष्णु के साधारण और सुंदर मंदिर की पृष्ठभूमि में एक तरफ अलकनंदा और दूसरी तरफ भागीरथी नदी है। यह सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए एक पवित्र स्थल है, जो लोग विशेषकर वैषनव-दर्शन का पालन करते हैं। इस मंदिर के मुख्य देवता विष्णु हैं, जिनको रघुनाथ, पुरोषोत्तम इत्यादि नाम से पुकारा जाता है। यह नाम श्रीराम को निरूपित हैं।


श्रीराम गद्दी, श्रीरघुनाथजी मंदिर, देवप्रयाग, टेहरी गढ़वाल, उत्तराखंड मंदिर प्रांगण तक पहुंचने के लिए लगभग पचास कदम चढ़ने पड़ते हैं। लंबा विशाल गुंबद काफी दूर से दिखाई देता है। मंदिर परिसर बहुत ही सादा और छोटा है। गरुड़जी की प्रार्थना करने के बाद भगवान रघुनाथजी के दर्शन के लिये एक मुख्य कक्ष में प्रवेश करतें हैं। श्रीराम उपनाम श्रीरघुनाथ अपने भक्तों को आशीर्वाद देने के लिये खड़े मुद्रा में हैं। दाईं तरफ श्री नरसिंमा का मंदिर है। जब आप खुले आंगन में आतें हैं तो श्री राम के सिंहासन को देख सकते हैं। भक्तों ने जब भी अपनी इच्छाओं को श्रीराम के सिंहासन समक्ष रखा तो उन्हें सुना गया और श्रीराम द्वारा आशीर्वाद प्रदान किया जाता है।


यहां परिसर में एक पीपल का पेड़ है, जहां यह कहा जाता है, कि यहां श्रीराम ने तप किया था। तथा श्रीलंका में युद्ध के दौरान अर्जित पापों से मुक्ति पाने के लिये, श्रीराम ने हवन किया था और श्रीराम ने अपने माता-पिता के लिए तर्पण भी किया था। इसीलिए भक्तगण अपने मृतक माता-पिता के धार्मिक-संस्कारों के लिए इस क्षेत्र को पवित्र मानते हैं।


श्री कादीनगर
जैसा कि पहले कहा, देवप्रयाग दिव्य तीर्थ-स्थलों में से एक है और इसे तिरुक्कण्डाम या कादीनगर इत्यादि से भी जाना जाता है। श्री पेरियल्वर बारह आळ्वारऔं में से एक थे, जिन्होंने इस क्षैत्र के देवता की प्रशंसा में ग्यारह भजन गाये थे। हांलाकि भजन प्रभु की प्रशंसा में ही गाये थे, फिर भी उन्होंने असाधारण शब्दों में बह रही नदियों की सुंदरता का वर्णन किया था।


श्री रघुनाथजी मंदिर, हनुमान गुफा, संगम, देवप्रयाग, टेहरी गढ़वाल, उत्तराखंड उनके शब्दों में - गंगा कोंद्रै के खिले फूलों के साथ बहती है शिव की जटाओं को सजाने के लिये जो बहुत शोभामान हैं। और तुलसी नारायणन के पैरों में विभूषित है। यह चोमुखी ब्राह्मा के हाथों से चमकते हीरे लेकर चर्तभुज विष्णु के पैरों से शंकर की जटाओं में विराजमान होती है। यह हिमालय के पहाड़ों से उतरकर महान समुद्र के लिए बहती है।


इसकी गर्जना से पहाड़ियां में थरथराहट होती है, जोकि सारी पृथ्वी पर फैल जाती है। गंगा का सुगंधित पानी कर्पगा फूल [एक दिव्य फूल] के साथ मिलकर, गंगा में स्नान करती युवा लड़कियों का मधुर सुगंधित चंदन, और इंद्र का अद्भुत हाथी ऐरावत की सुगन्धित कस्तुरी। गंगा के किनारे यज्ञ की खुशबू दोनों तट पर फैल जाती है और उसका धुआं-प्रवाह लगातार बहुत ऊँचाई तक उड़ता रहता है। गंगा की बाढ़, ध्वनि के साथ पहाड़ों को हिला देती है और भूमि को खोखला कर देती है। नदी के उफान से किनारे पर खड़े पेड़ गिर जाते हैं। और फिर गंगा सागर के पानी में उत्तेजना से मिलती है।


श्री पेरियल्वर के ये शब्द आज भी सत्य हैं, इस महान भक्त के शब्दों में सच का एहसास करने के लिए संगम में रहकर ही जाना जा सकता है। यहां दो नदियों की ध्वनि और आसपास की पहाड़ियों के मनोरम दृश्य आपको मंत्रमुग्ध कर देगें।


संगम से उत्पन्न गंगा नाम
श्री हनुमान, श्री राम पधम, गंगा माँ मंदिर, देवप्रयाग, टेहरी गढ़वाल, उत्तराखंड जहां से गंगा नदी शुरू होती है, वो देवप्रयाग है। यहां दो नदियों का मिलन का स्थान, नाक की तरह एक प्रक्षेपण की नोक लगती है। दूर से देखने पर यह एक अद्भुत दृश्य है। अलकनंदा और भागीरथी नदियों के दो अलग-अलग रंगो का अवलोकन और गंगा का तीसरा रंग जीवन में कभी नहीं भुलेगा। इन दो नदियों के संगम स्थल पर स्नान करने के लिए लगभग पचास-साठ सीढ़ियां नीचे आना पड़ता है। मानसून के दौरान विभिन्न जल स्तर को समायोजित करने के लिए स्नान घाट को बहुखंडीय बनाया गया है।


स्नान घाट पर आप सींढ़ियों के दोनों ओर एक-एक गुफा देखते हैं और वहां से गुजरते हुये स्नान स्थल पर पहुंच जाते हैं। एक को "सूर्या गुफा” और अन्य को "हनुमान गुफा" के रूप में अंकित किया था।


श्रीराम और देवप्रयाग
श्रीराम ने इस क्षेत्र का दौरा किया था और इस संगम में प्रभु के कमल जैसे पद-चिन्ह हैं। माना जाता है कि यहां श्रीराम ने अपने माता-पिता के लिए तर्पण किया था। इसीलिये लोग, यहां अपने पूर्वजों के लिए धार्मिक-संस्कार करना, मंगलकारी मानते हैं। रघुनाथ मंदिर में एक जगह है जहां श्रीराम ने तप किया था। यहां भक्तगण अपनी इच्छायें व्यक्त करने से, श्रीराम निश्चित ही साकार कर देते हैं।


श्री हनुमान गुफा और श्री हनुमान
श्री गंगा मां मंदिर के पास ही संगम के किनारे पर एक छोटी सी गुफा है जोकि श्री हनुमान गुफा के नाम से जानी जाती है। यह कहा जाता है कि भगवान हनुमान यहां आये थे और उन्होंने देवप्रयाग में पवित्र स्नान के बाद श्रीराम पर ध्यान लगाया था। इस चट्टान के शीर्ष पर श्री हनुमान जी की मुर्ति उभरी हुई है। भक्तगण संगम में स्नान के बाद, श्री गंगा मां, श्रीराम के पद-चिन्ह, और फिर श्री हनुमान की पुजा-अर्चना करतें हैं। तदोपरान्त ही श्री रघुनाथ मंदिर में भगवान श्री रघुनाथजी [श्रीराम] की पुजा-अर्चना करते हैं।


|| सीतापति रामचन्द्र की जै। पवन सुत हनुमान कि जै। ||



अनुभव
देवप्रयाग के इस पवित्र संगम पर श्री गंगा मां एवं श्री हनुमानजी की पूजा करके, आप भी श्री रघुनाथजी का आशीर्वाद प्राप्त करें॥

 

 

 

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

 

ed : january 2016