जब सात पहाड़ियों के बारे में सोचेंगे, तब दक्षिण में भगवान बालाजी का निवास स्थान तिरुपति याद आयेगा। सात पहाड़ियों के एकत्री करण में. शेशाद्री,
वेदाद्री, गरूदाद्री, अंजनाद्री,व्रिशभाद्री, नारयणद्री, और वेंकटद्री इत्यादि नाम से जानी जाती हैं। सातवां शिखर "वेंकटाद्री" भगवान बालाजी का निवास
स्थान है। इन्हीं में से एक पहाड़ी "अंजनाद्री" भगवान हनुमान की माता अंजना देवी को समर्पित है।(संस्कृत में "Adri" का मतलब -एक पहाड़ी है)।
यह कहा जाता है, कि यहां बानर मुखिया केसरी की पत्नी अंजना देवी ने प्रभु महेश्वर का नाम-जप का तप किया था। उपहार स्वरूप प्रभु महेश्वर ने
अंजना देवी को एक वरदान दिया। अंजना देवी को केसरी के माध्यम से "रूद्र-अंश" के रूप में एक बच्चे को पालना पड़ेगा। इस प्रकार माता अंजना देवी
को अपने बेटे के रूप में हनुमानजी आशीर्वादानुसार प्राप्त हुए थे। इस संस्करण में भिन्नता है, लेकिन फिर भी उन रूपों में अंजना देवी ने इस पहाड़ी में
तपस्या की, इसका उल्लेख है। इसलिए इस पहाड़ी को "अंजनाद्री" नामित किया गया था।
हिमाचल प्रदेश की वर्तमान राजधानी शिमला जोकि कभी गर्मीयों में भारतवर्ष की राजधानी हुआ करती थी। यही संसार का शहरी जंगल है। जहाँ
शिमला का इतिहास और विरासत का एक विशाल राशि-आसुत किया गया है, तथा वहीं शिमला सात पहाड़ियों से गिरा हुआ है। उनमें से एक पहाड़ी
कामना देवी को समर्पित है, और उसे प्रोस्पेक्ट हिल से जाना जाता है। सातों पहाड़ियों में सब से ऊँची पहाड़ी २४५५ मीटर है। जाखु पहाड़ी शिमला के
उपर एक ताज की तरह शोभित है। पहाड़ी के उपर एक छोटा सा सुंदर मंदिर, ऎसा लगता है कि, जैसे ताज पर रूबी जड़ा हो। पहाड़ी के उपर पहुँचने
तक, १.५ कि.मी. की चढ़ाई रिज़ से ही शुरू हो जाती है।
हनुमान मंदिर जिसे ताज पर रूबी की तरह देखा जाता है, वो भगवान हनुमान को समर्पित है। पहाड़ी की चोटी पर, मंदिर के पास कई बंदरों द्वारा स्वागत किया जाता है। वे आगंतुकों से 'प्रसाद' पाने के लिए आगंतुकों पर चाल खेलतें हैं। जैसे कि एक चप्पल ही उठा लेना, आगंतुकों का चश्मा दूर ले जाना, थैला दूर रख देना, इत्यादि। लेकिन आगंतुकों से प्रस्तुत 'प्रसाद' पाने के बाद, बिना कोई नुकसान के, आगंतुकों का सामान लौटा देतें हैं।
यह पूजा स्थल, अनादिकाल से विद्यमान है, उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में ब्रिटिशरस ने गर्मियों के लिये एक शहर के रूप में अन्नाडेल को विकसित किया था। वर्तमान मंदिर का निर्माण हिमाचल प्रदेश में प्रचलित वास्तुकला के अनुसार वर्ष 1920 के दौरान करवाया गया था। इस जगह वर्ष 1837 में एक स्थायी संरचित मंदिर का निर्माण पूजा के लिये किया गया था।
इस जगह पूजास्थल बनने के पीछे दो किवदंतीयाँ प्रचलित हैं। पहली किवदंती अनुसार, यह घने जंगलों की पहाड़ी की चोटी, (अभी भी यह वन घना है)
जिसे भगवान हनुमान ने देखा, जब वो संजीवनी वूटी की खोज में आकाश मार्ग से उड़कर हिमालय पर्वत को जा रहे थे। संजीवनी वूटी, श्रीलंका युद्धभूमि
में मुर्छित लक्ष्मण को जीवित करने के लिये अत्यंत आवश्यक थी। हनुमानजी संजीवनी वूटी मिलने की आशा से यहाँ ठहरे थे। दुसरी किवदंती अनुसार,
वह संजीवनी वूटी की खोज में आकाश मार्ग से उड़कर हिमालय की ओर जाते हुये, उनकी खड़ाऊँ इस स्थान पर गिर गई थी।
यह हनुमान मंदिर, पागल बना देने वाली भीड़-भाड़ से दूर, सुंदरता से परिपूर्ण और शांत वातावरण में स्थित है। यहाँ की स्वच्छ एवं तेज हवा का बहाव आपकी सारी सांसारिक चिंताओं को भूला देगा, तदुपरान्त आप भगवान हनुमान के पिता वायुदेव केसरी का शुक्रिया अदा करेंगे। यहाँ आप मन की शांति पाने के लिए घंटो ध्यान कर सकतें हैं।
जो भी घुमने के लिये शिमला आता है, वो इस मंदिर को देखने जरूर जाता है। इस स्थान से सुर्योदय एवं सुर्यास्त विशेषकर वर्षा रितु में बड़ा मनमोहक होता है। और यह जीवन भर के लिये एक अनोखी याददाशत बन जाता है।