श्री गोमय हनुमान मंदिर, श्री स्मर्थ रामदास मठ
तक्ली, नासिक,महाराष्ट्रा

जी के कोशिक

 

श्री स्मर्थ रामदास
जम्पा क्षेत्र में श्री सूर्याजी पंथ और रानुवाई दंपति का दूसरा सुपुत्र श्री नारायणन को बाद में श्री समर्थ रामदास के रूप में जाना जाने लगा था, उसने ही सार्वभौमिक प्रेम और श्री राम नाम की महिमा का प्रचार किया था। कृपया 'श्री हनुमथं भक्तों' अनुभाग में इस संत की संक्षिप्त जीवनी पढ़ें ।।


श्री नरायण का विवाह
श्री नारायण की माँ रानुवाई अपने पुत्र का विवाह करना चाहती थीं, जोकि प्रस्ताव के लिए अनिच्छुक था। जब माँ ने अपने से बेटे कहा कि वो "मंगलाष्टकम" [शादी के साथ जुड़ी एक रस्म] सुनना पसंद करेगा तथा साथ में गुजारिश की, तब वो अनिच्छा से सहमत हुए।


वर्ष १६२० में निर्धारित दिन जब शादी की व्यवस्था की गई थी और पूरा जम्पा गांव इस अवसर के लिये सजा था। श्री नरायणन को अवसरानुसार पोशाक के साथ तैयार किया गया था।


"मंगलाष्टकम" (आठ) श्लोकों का उच्चारण हुआ और हर श्लोक के अतं में सुलखने सवधना बोला गया। सातवें श्लोक तक सामान्य रूप से चला, लेकिन जब "मंगलाष्टकम" का आठवाँ शलोक बोला गया और पर्दा उठाया गया, चारों ओर इकट्ठा लोगों ने दूल्हे श्री नारायणन को वहाँ नहीं पाया। किसी को भी दिखाई दिये बिना ही उन्होंने उस जगह को छोड़ दिया था, तदोपरातं समारोह स्थल के बाहर पेड़ पर चढ़ गए और नदी की बदती धारा में कूद गए। नदी के साथ-साथ तैरते हुये कुछ मील की दूरी के बाद, वो अपने मन द्वारा निर्देशित मार्ग पर चल पड़े।


श्री नारायणन के बड़े भाई श्री गंगाधर ने अपनी माँ रानुवाई को बताया कि श्री नारायणन साधारण व्यक्ति नहीं है, वो एक महापुरूष है, और इसलिये उसकी चिन्ता न करे। इसके अलावा आप "मंगलाष्टकम" सुनाना चाहती थीं इसके लिये वो सहमत हुए और वो विवाह इत्यादि के लिए सहमत नहीं थे।


श्री रामदास
श्री स्मर्थ रामदास और् श्री छत्रपति वीर शिवाजी, गोमय हनुमान मंदिर, तक्ली, नासिक,महाराष्ट्रा
इ्सी बीच श्री नारायणन ने अपने पैतृक स्थान जम्पा क्षेत्र को छोड़ दिया, जंगलों से और नदी के किनारे चलते हुये बारवें दिन वो नासिक में पंचवटी पहुंच गये। गोदावरी नदी के तट पर, दूल्हे के वस्त्र उतारकर, उपर एक साधारण सा वस्त्र और कूल्हे पर एक छोटा सा कपड़ा पहन लिया। वो अपनी दिनचर्या सूर्यनमस्कार, ध्यान-जप तथा श्री रामनाम संकीर्तन से शुरू करते थे। पास से गुजर रहे लोग, उनके श्री रामनाम संकीर्तन से आकर्षित होते थे, बाद में उन्हें श्री रामदास के रूप में जाना जाने लगा। यह वो जगह है, जहाँ श्री राम खुद रहते थे उनकी याद में खुशी-पुनर्जीवित हुई थी, और वह परिपूर्ण आनन्द में इस जगह के आसपास घुमते और खुशी में रंगरेलिया मनाते, उनके जीवन में श्री राम की याद अवतरित हो चुकी थी। वो प्रतिदिन सुबह गोदावरी नदी में स्नान करने के बाद श्री काले राम मंदिर दर्शन के लिये जाते, तथा श्री राम, श्री सीता और श्री लक्ष्मण की पूजा-अर्चना करते, तदोपरान्त ध्यान के लिए अपने चुने स्थल पर चले जाते थे।


पवित्र स्थान तक्ली
वो सिर्फ तेरह बर्ष के थे, उनकी दिनचर्या तथा इस कार्यप्रणाली के दौरान, उनको इस जगह का पता लगा, जहां गोदावरी नदी के साथ एक छोटी नदी मिलती थी और उसका नाम नंदिनी संगम था। इस जगह को तक्ली नाम दिया गया था। और इसे बहुत लोगों द्वारा पवित्र माना जाता है, और कई साधु इस जगह में फैले हु्ये देखे जा सकतें हैं। उन्होंने इस पवित्र स्थान पर, शुक्ला सप्तमी [राधा सप्तमी] साल १६२१ हिंदू चंद्र कैलेंडर के माघ महीने में श्री राम पर अपना ध्यान लगाना शुरू किया था।


बारह बर्ष का ध्यान
श्री नारायणन को अब श्री रामदास के रूप में जाना जाने लगा था, उनके एक हाथ में कमंडल और कंधे पर लटकी एक छोली के साथ साधारण सी लंगोटी पहनते थे। वह कुछ नहीं चाहते थे, और लोगों ने उन्हें बहुत प्रेम दिया, उनकी आखें करुणा से ओत-प्रोत, किसी विशेष पर आकर्षित नहीं थीं, और खुशी में डूबी हुई दिखाई पड़ती हैं। उनकी दिन के लिए लगभग एक सी दिनचर्या थी, सुबह के स्नान और सुर्यानमस्कार के बाद, वो सीने तक नदी के गहरे पानी में खड़े होकर श्री राम पर अपना ध्यान लगाते थे। और साधुओं के साथ वेदिक चर्चा के लिये दोपहर में पानी से बाहर आ जाते थे। संध्या समय वह श्री राम मंदिर में श्रीमद रामायण पर व्याख्यान सुनते थे। रात के दौरान वहाँ अखंड नाम जाप होता था उसमें समान्य रूप से भाग लेते थे। यह दिनचर्या बारह साल तक चली और तब तक इस पवित्र स्थान पर तैरह करोड़ श्री राम नाम का जाप पूर्ण कर लिया था।


श्री रामदास का पहला शिषय
श्री रामदास नदी गोदावरी में स्नानोपरातं किनारे पर कदम रख रहे थे, तभी एक महिला जिसका नाम अन्नपूर्णी था उनके पैरों पर गिर गई। उसने अपने पति को खो दिया था और पति के शरीर को साथ लाई थी। लेकिन श्री रामदासजी ने औरत को आशीर्वाद दिया: "अष्टपुत्र सोभाग्यवती भव:"। जब यह बताया कि महिला ने अपने पति को खो दिया, तो श्री रामदास ने कहा, "मैंने उन शब्दों को श्री राम की इच्छअनुसार ही बोला था।" उन्होंने अपने कमंडल से पानी लिया और मनुष्य के शरीर पर छिड़क दिया। कुछ ही क्षणों में आदमी गिरिधर भांदा कुलकर्णी, जो मृत था उठ खड़ा हुआ, मानो नींद से जागा हो। फिर कुलकर्णी परिवार ने श्री रामदास को अपने पहले बेटे को दे दिया था। श्री रामदास ने एक भिक्षा के रूप में अपने छोली में लड़का प्राप्त किया। उन्होंने उसका नाम श्री उद्धव गोस्वामी रखा था।


श्री रामदास द्वारा पहले मठ की स्थापना
तक्ली वो जगह है जहाँ श्री रामदास ने पहले मठ की स्थापना की थी। उन्होंने श्री उद्धव गोस्वामी को इस संस्थान का प्रमुख्य बनाया था। उन्होंने अपने प्रवास के दौरान श्री हनुमान की गाय के गोबर से पहली मूर्ति स्थापित की थी। आज श्री मारूति को "तक्ली गोमय मारूति" के रूप में जाना जाता है, और श्री रामदास के पहले शिष्य के वंशजों द्वारा ही पूजा-अर्चना की जाती है।


श्री गोमय मारूति मंदिर, श्री स्मर्थ रामदास मठ, तक्ली, नासिक महाराष्ट्रा
श्री गोमय हनुमान, श्री गोमय हनुमान मंदिर, तक्ली, नासिक,महाराष्ट्रा
आश्रम दो नदियों के संगम स्थल पर बना हुआ है, जिसकी प्राकृतिक सुंदरता अतुलनीय है। आज गोदावरी नदी का धारा-प्रवाह थोड़ा दूर चला गया है, पर नंदिनी नदी अभी भी आश्रम के साथ से बहती है। अब नंदिनी नदी को नसर्दी नदी से जाना जाता है। नदी के तट पर एक लंबे पूर्व-पश्चिम भवन में कार्यालय और तीर्थयात्रियों के लिये विश्राम कक्ष इत्यादि हैं। इस के समांतर ही एक २५ x १५ फीट के भवन में मुख्य मंदिर स्थित है। इस मंदिर के सामने, लगभग २० x ७० फीट एस्बेस्टस शीट की छत का विशाल कक्ष भजन कीर्तन इत्यादि के लिये भक्तों की मण्डली द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। वहाँ एक बोर्ड है, जोकि दावा करता है, कि १६३३ ई. में श्री स्मर्थ द्वारा यह मंदिर स्थापित किया गया था।


मंदिर में गोमय मूर्ति पश्चिमोमुखी है, जोकि दक्षिण की ओर चलते हुये दिखाई देती है। मारुति मूर्ति के समीप महान संत की पादुकाएँ रखने के लिये एक मंडप है, पादुकाएँ पुजा के लिये रखी हैं, और संत की पेंटिंग पीछे दीवार पर है। निकटस्थ गुरू की समाधि की बाईं ओर एक मंडप है, जिसमें कुछ श्री मारुति मूर्तियों के साथ-साथ देवता श्री राम भी हैं।


यहाँ छत्रपति वीर शिवाजी की प्रतिमा अपने गुरु श्री रामदास से शिक्षाएँ प्राप्त करते हुये दिखाई देतें हैं।


प्रतिदिन प्रात: इन देवताओं के साथ ही श्री गुरु रामदास के "पादुका" की कक्डा आरती की जाती है।


गोमय मारूति
इस क्षैत्र में श्री स्मर्थ रामदास द्वारा स्थापित श्री मारूति की मूर्ति लगभग नौ फीट ऊँची है। भगवान खड़ी मुद्रा में हैं, उनका बाँया हाथ छाती पर और दाँया हाथ "अभय मुद्रा" में है। ये ही एक ऐसी श्री मारूति की मूर्ति है जोकि गाय के गोबर से बनी हुई, और उपर सिंदूर चढ़ा हुआ है, तकरीबन ३८० साल पुरानी मूर्ति जिसकी श्री गुरू रामदास के पहले शिषयों के मुखिया द्वारा पुजा की जाती थी। इस आश्रम में आज भी श्री समर्थ रामदास द्वारा स्थापित देवता, भक्तों को आत्मविश्वास और शांती प्रदान करतें हैं।




|| सीतापति रामचन्द्र की जै। पवन सुत हनुमान कि जै। ||



अनुभव
श्री हनुमान भक्तों का प्रयास होना चाहिए कि श्री गुरु रामदास और श्री गोमय मारुति का आशीर्वाद हेतु, इस पवित्र-पावन क्षैत्र में आयें और आश्रम में रात भर रूकें॥

 

 

 

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

 

ed : July 2016