श्री व्यासराजा प्रतिष्ठापन हनुमान
एल्लैकरै श्री हनुमान मंदिर, श्रीनिवासा नगर, श्रीरंगम, तमिल नाडु

जी के कोशिक

 

श्रीरंगम और श्रीरंगनाथ मंदिर
तमिलनाडु त्रिची के पास में श्रीरंगम एक सौ आठ दिव्य-स्थलों में से एक है। बारह आळ्वार में से ग्यारह आळ्वार इस क्षेत्र के इष्टदेव श्री रंगनाथन की प्रशंसा में गाये गये थे। श्री हरि के भक्तों के लिए 'कोविल' का मतलब केवल इस क्षेत्र से है। मंदिर परिसर बहुत बड़ा है, जोकि अपने आप में एक शहर है। और परिसर की वास्तुकला ऐसी है, कि मुख्य देवता सात घिरी से घिरी हुई है। श्रद्धेय मंदिर द्वैत दर्शन का केंद्र था जिसका एक लंबा इतिहास रहा है।


श्रीरंगा महतय्म में श्रीरंगम तमिलनाडु के महान मंदिर की उत्पत्ति के बारे में विस्तार से वर्णन है। ब्रह्मा जी ने श्री विष्णु पर ध्यान साधना की और अपने सर्वोच्च मदहोशी में विष्णु देवता से "रंग विमान" का वरदान प्राप्त किया। रंगनाथन, राजा धर्म वर्मा की भक्ति से मोहित थे। और राजा धर्म वर्मा भगवान रंगनाथन को स्थायी रूप से श्रीरंगम में रहने के लिए तपस्या कर रहे थे। उन्होंने लंका पर सदा अपनी सौम्य नज़र रखने का वादा किया। इसलिए देवता दक्षिणमुखी लंका की तरफ झुकी मुद्रा में हैं। देवता विराजा, वैवस्वट, मनु, इक्ष्वाकु और अंत में श्री राम को ब्रह्मा द्वारा दिये जाने के बाद अयोध्या में पूजा में था। चूंकि देवता "रंगा विमान" इक्ष्वाकु के राजवंश द्वारा पूजित था उन्हें "कुल धनं" से पुकारा जाता था। श्री राम ने अयोध्या में एक लंबे समय तक देवता की पूजा की थी। और उसे उपहार में श्री विभीषण लंका के राजा को दे दिया था। जब विभीषण लंका को त्रिची होते हुये जा रहे थे तो रास्ते में, देवता श्रीरंगम में रहना चाहते थे।


श्री रंगनाथ मंदिर के लिए योगदान - श्रीरंगम
दक्षिण भारत को शासन करने वाले लगभग सभी राजाओं ने इस मंदिर के विकास में योगदान किया था। इस मंदिर में आयोजित दैनिक पूजा और त्योहारों के लिए कई गांव उपहार स्वरूप इस मंदिर को दिए गए थे। इस प्रकार मंदिर परिसर एक शहर बन गया, और देवता देश में सबसे अमीर।


श्रीरंगम में मलिक काफूर
श्रीरंगम का गौरवशाली इतिहास उन दिनों से है, जब से यह मंदिर शहर धर्म वर्मा के शासन के आधीन था। आधुनिक समय में हम यह भूला नहीं सकते कि मलिक काफूर ने शहर को लूटा तथा दिल्ली सल्तनत को शासन करने के लिए रास्ता साफ किया था।


मलिक काफूर (१२९६-१३१६) एक हिजड़ा था जोकि अलाउद्दीन खिलजी की सेना में जनरल था, अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली सल्तनत का शासक (१२९६-१३१६) था। मलिक काफूर दिल्ली सल्तनत विंध्य सीमा से भी परे, अपने राज्य का विस्तार करने के लिए जिम्मेदार था। उसने न केवल दक्षिण के शासकों को दिल्ली सल्तनत के तहत लाया था, बल्कि उसने मंदिरों, सार्वजनिक और दक्षिण के शासकों का धन भी लूटा था। उसका दक्षिण के हिंदू मंदिरों को नष्ट करने का कृत्य अच्छी तरह से इतिहास में दर्ज हैं। श्रीरंगम उसकी बर्बरता का कोई आक्षेप नहीं है। दक्षिण प्रदेशों में स्वामित्व वाली जगहों पर दिल्ली सल्तनत का एक प्रतिनिधि नियुक्त करने के बाद, वह लूट के साथ दिल्ली के लिए रवाना हुआ।


मुस्लिम इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी के अनुसार, मलिक काफूर २४१ टन सोना, २०००० घोड़े और ६१२ हाथियों पर लूटा हुआ खजाना लादकर वापस दिल्ली चला गया।


नम पेरूमल
श्री रंगनाथन भगवान की उत्सव मूर्ति नमपेरूमल नाम से जानी जाती है। जिस समय दक्षिण भारत मलिक काफूर द्वारा आक्रमणॊं के दौर में था, श्री रंगनाथ के भक्तों ने देवता के लिये एक अस्थायी मंदिर बनाया था, और नमपेरूमल को एक सुरक्षित दूर जगह पर ले गये थे। नमपेरूमल को छुपाकर सुरक्षित क्षेत्रों से यात्रा कराई थी, और इस यात्रा के दौरान भक्तॊं ने पूजा-अर्चना भी अर्पण की थी। नमपेरूमल साल १३२२ से श्रीरंगम में मूलावर से दूर रहे थे, और वर्ष १३७१ के बाद ही तथा शांति स्थापित होने के उपरांत, विजयनगर शासन के अधीन श्रीरंगम में लौट आए थे।


विजयनगर साम्राज्य
विजयनगर साम्राज्य १३३६ ई. में हरिहर प्रथम और उनके भाई बुक्का राय प्रथम द्वारा दक्षिण भारत में डक्कन के पठार क्षेत्र में स्थापित किया था। साम्राज्य १३वीं सदी के अंत तक, इस्लामी आक्रमणों से चौकसी करने के लिए की परिणति के रूप में प्रसिद्धि की चरम सीमा पर पहुँच गया था। साम्राज्य हरिहर और बुक्का द्वारा स्थापित, समर्थित था, और श्री श्री श्री विद्यारण्य, शंकराचार्य श्रृंगेरी मठ, दक्षिण भारत पर मुस्लिम आक्रमण से लड़ने के लिए प्रेरित थे। यह वंश संगमा राजवंश के रूप में जाना जाता था। उन्होंने पूरे दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त की, और अपने प्रतिनिधियों के रूप में "मंडलेश्वररों" को शासन करने के लिए नियुक्त किया था।


साम्राज्य द्वारा नियुक्त सभी "मंडलेश्वररों" ने मंदिरों का नवीकरण करवाया और सनातन धर्म के अनुयायियों के बीच एकता पैदा की थी।


राजनीतिक परिदृश्य में परिवर्तन
साम्राज्य की बागडोर साल १४८५ में एक मंडलेश्वरर सालुवा नरसिंह देव राय ने संगम राजवंश के सम्राट प्रौधदेवराया से हड़प ली थी। १४८६ में उसने अपने आपको सम्राट घोषित किया और एक नए राजवंश सालुवा साम्राज्य की स्थापना की थी।


तमिलनाडु का कोनेरिरायन
यह देखकर, कि एक मंडलेश्वरर साम्राज्य बन गया, तो कई मंडलेश्वररों ने, जोकि तब तक विजयनगर साम्राज्य के प्रति वफादार थे, अपने आप को स्वतंत्र घोषित कर दिया था और खुद अपने क्षेत्र पर शासन शुरू कर दिया था। उनके बीच में उल्लेखनीय कोनेरिरायन और तमिलनाडु क्षेत्र में महाबली वानातीरायन थे।


श्रीरंगम कोनेरिरायन के शासन के अधीन था और श्रीरंगम में इस मंदिर के लिए तथा तिरुपति मंदिर को भी, कई योगदान किये थे। हालांकि वह एक शीवेत था, फिर भी वैष्णव पंथ के लिए प्यार था।


बाध्य राजनीतिक कारणों से और विजयनगर में संगमा राजवंश से तुलुवा वंश को प्रशासनिक परिवर्तन के कारण, तब के तुलुवा सम्राट नरसा नायक ने वर्ष १४९६ में कोनेरिरायन के खिलाफ एक युद्ध लड़ा, और श्रीरंगम को अपने अधीनस्थ कर लिया था।


नरसा नायक का भाई कंथादै रामानुजर, श्रीरंगम में एक बिरही संत था। कंथादै रामानुजर ने अपने भाई नरसा नायक को मंदिर के मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए कहा जोकि कोनेरिरायन के नियंत्रण में था। उसके निमंत्रण पर नरसा नायक ने विजयनगर सम्राट के कार्यकर्ताओं पर हमला किया और कोनेरिरायन का क्षेत्र जीत लिया था।


श्रीरंगम और तिरुवानैकावल का सीमा का विवाद
यह कहा जाता है कि प्राचीन दिनों में यह प्रथागत था कि वार्षिक ब्रह्मोत्सव दौरान, नमपेरूमल - श्री रंगनाथन की उत्सव मूर्ति अपनी बहन श्री अखिलान्डेश्वरी अम्बा तिरुवानैकावल को मिलने के लिए थोड़ी देर मंडपम में तिरुवानैकावल मंदिर के प्रवेश द्वार के पास आते थे, और विश्रामोपरांत, श्रीरंगम के लिए वापस जाते थे।

मलिक काफूर के आक्रमण के दौरान नमपेरूमल प्रभु मंदिर से दूर थे। लगभग ५० साल बाद, श्री रंगनाथन उत्तसवर (नमपेरूमल) साल १३७१ में श्रीरंगम वापस आये थे। लगभग नब्बे साल की अनुपस्थिति के बाद नमपेरूमल का तिरुवानैकावल जाने का अभ्यास बहाल हुआ था, लेकिन इस पुनरुद्धार के लिए थोड़ा प्रतिरोध था। तब से वहाँ श्रीरंगम और तिरुवानैकावल के बीच विवाद क्षेत्राधिकार के संबंध में था।


मध्यस्थता के प्रयासों के बावजूद विवाद जारी रहा..................


श्री व्यासराजा
श्री व्यासराजा उस समय के एक महान संत और श्री माधवाचार्य के द्वैत दर्शन के अनुयायी थे। श्री व्यासराजा दोनों सालुवा और तुलुवा राजवंशों के राजगुरू थे। उन्होंने मलिक काफूर के हमले के दौरान नष्ट हुये मंदिरों के नवीकरण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वह श्री हनुमान के एक बड़े भक्त थे, तथा उन्होंने श्री हनुमान के लिए कई मंदिरों का निर्माण करवाया था।


उसके बारे में अधिक जानकारी के लिए हमारी साइट पर "श्रि हनुमान मक्त - श्रि व्यासराजा" में पढ़ें।


लगातर विवाद - हल?
Akilandeswari amman, Thiruvanaikavil श्री व्यासराजा विजयनगर साम्राज्य के राजगुरू श्रीरंगम के दौरे पर थे। जब उनको इस तरह के दौरे पर श्रीरंगम और तिरुवानैकावल के बीच का सीमा विवाद बताया गया था। तो उन्होंने इस बार बार उभरती अप्रिय समस्या का समाधान पेश किया था। उन्होंने कहा कि वह अपनी सांस रोककर और श्री रंगनाथ के मुख्य गर्भगृह में चार दिशाओं में से प्रत्येक दिशा में चलेगें। जहाँ भी सांस थमना बंद हो जायेगा, वह स्थान श्रीरंगम की सीमा के रूप में चिह्नित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि वह अपनी सांस रोककर और श्री रंगनाथ के मुख्य गर्भगृह से चार दिशाओं में से प्रत्येक में चलना होगा। वह जहाँ भी उसकी सांस थमनी बंद हो जायेंगी, वह स्थान श्रीरंगम की सीमा के रूप में चिह्नित किया जाएगा।


जैसे कहा वैसे ही किया, वह सभी दिशाओं में गये और श्रीरंगम की सीमा निर्धारित की थी।


एल्लैकरै-सीमा
यह विजयनगर की प्रथागत था कि गांवों की सीमा को श्री ह्नुमान मंदिरों के साथ चिह्नित किया जाता था। बिना किसी आक्षेप के श्री व्यासराजा, जो श्री हनुमान के भी भक्त थे, श्रीरंगम की सीमा को चिह्नित करने के लिये चारों दिशाओं में चार हनुमान मंदिरों का निर्माण करवाया था। आज उनमें से तीन अस्तित्व में हैं, और एल्लैकरी मंडपम में समय के साथ हटा दिया गया है।


वार्षिक उत्सव के आठवें दिन नमपेरूमल कोल्लिडम नदी के तट पर श्रीरंगम के अन्य एल्लैकरी [सीमा] आतें हैं। यह श्री रंगनाथ मंदिर के उत्तर पूर्व में है। इस एल्लैकरी [सीमा] पर एक मंडपम है, और श्री रंगनाथ आठवें दिन यहाँ एक पालकी में आतें हैं, और अपने मंदिर को वापस कोल्लिडम नदी द्वारा एक घुड़सवारी वाहन से जातें हैं। इस जगह पर मंडपम "एल्लैकरी मंडपम" से जाना जाता है। यह इस प्रथा का हिस्सा है, लेकिन तिरुवानैकावल की यात्रा के बिना, जैसाकि उपर के अनुच्छेदों में विवरण दिया गया है।


यहां आस-पास में श्री हनुमान का कोई मंदिर नहीं है।


पहला हनुमान मंदिर श्रीनिवास नगर में रेलवे पुल के पास है। यह श्री रंगनाथ मंदिर के दक्षिण पूर्व में है। दूसरा अम्मा मंडपम जो श्री रंगनाथ मंदिर के दक्षिण में कावेरी नदी के तट पर है। तीसरा मेलूर मार्ग पर श्रीरंगम से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर है, जोकि श्री रंगनाथ मंदिर के उत्तर पश्चिम में है


वर्तमान में "एल्लैकरी" उपसर्ग के साथ दो स्थान जाने जाते हैं, जोकि संकेत देतें हैं, कि इसे श्रीरंगम शहर के क्षेत्र का सीमांकन के रूप में इस्तेमाल किया गया। पहला एल्लैकरी मंडपम है, और दूसरा श्रीनिवास नगर में एल्लैकरी हनुमान मंदिर है।


एल्लैकरै हनुमान मंदिर
एल्लैकरै हनुमान मंदिर, श्रीरंगम, तमिल नाडु श्रीनिवास नगर में मंदिर, रेलवे का उपरिगामी पुल के पास, एल्लैकरै हनुमान मंदिर के नाम से जाना जाता है जोकि श्रीरंगम के श्री व्यासराजा मठ के नियंत्रण में है। यह श्री रंगनाथन मंदिर के दक्षिण पूर्व में स्थित है।

यह भगवान हनुमान का पश्चिम मुखी छोटा-सा गर्भगृह सहित मंदिर है। वहाँ गर्भगृह के ऊपर एक घड़े के साथ अलंकृत विमनम है।

भगवान श्री हनुमान
श्रीरंगम के भगवान एल्लैकरै हनुमान, ष्टदेव दो फुट ऊँचे ठोस ग्रेनाइट पत्थर के बने हैं। प्रभु पैदल मुद्रा में हैं जिनकी नक्काशी 'अर्द्ध शिला' पर की हुई है। भगवान दक्षिण की ओर चलते हुये दिखाई देतें हैं और अपने कमल जैसे पैरों में नूपुर और पायल पहने हुये हैं। कंगन उनके बायें हाथ में है जोकि दायें कूल्हे पर रखा है, और हाथ में सौगन्धिका फूल की पतली डंडी पकड़ रखी है। एक अध-खिला फूल उनके बाएं कंधे से ऊपर दिखाई दे रहा है। वो आभूषण पहने हुए है, जो उनकी छाती को शोभित कर रहें हैं। प्रभु दूसरे हाथ से अपने भक्तों को आशीर्वाद प्रदान कर रहें हैं। प्रभु की पूंछ सिर के ऊपर उठी हुई, घुमावदार अंत में एक खूबसूरत घंटी विभूषित है। भगवान कानों में कुंड्ल पहने हुये हैं जोकि उनके कंधे को छू रहे हैं, और उनकी केश बड़े करीने से बंधे हुये है। उनकी आँखें चमक रहीं हैं, और भक्त पर करुणा उत्सर्जन कर रहीं हैं।



|| सीतापति रामचन्द्र की जै। पवन सुत हनुमान कि जै। ||



अनुभव
इस क्षेत्र के भगवान हनुमान की तेजस्वी, चमकीली आंखों के कारण ही उनकी मूर्ति पर ध्यान साधना की जाती है। वो महायोगी हैं। इस क्षेत्र में उनकी उपस्थिति महसूस की जाती है। यहाँ ध्यान-साधना करने से मनुष्य के जीवन में शांति अवतरित होती है।

 

 

 

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

 

ed : april 2016