श्री हनुमान स्वामी मंदिर
पालयम, तिरुवनंतपुरम, केरल

जी के कौशीक

 

तिरुवनंतपुरम
पद्मनाभपुरम अब तमिल नाडु राज्य में स्थित है, जोकि तत्कालीन त्रावणकोर साम्राज्य की राजधानी था। त्रावणकोर राजधानी को देश का एक हिस्सा बनाने के लिए स्वतंत्र भारत के साथ एकीकृत कर दिया था। आज सभी पद्मनाभपुरम के अतिरिक्त तिरुवनंतपुरम को आसानी से जानते हैं। तिरुवनंतपुरम आधुनिक राज्य केरल की राजधानी है। ब्रिटिश शासन के दौरान शहर का नाम त्रिवेंद्रम था। भारत के किसी भी दूसरे शहर की तरह इस शहर का भी एक लंबा इतिहास रहा है।


शहर का नाम इस क्षेत्र के इष्टदेव श्री अनंत पद्मनाभ स्वामी के नाम पर रखा गया था। त्रावणकोर के राजा लोग श्री अनंत पद्मनाभ स्वामी द्वारा शासित राज्य के संरक्षक के रूप में जाने जाना चाहते थें। इसीलिये उन्होंने एक आज्ञाकारी नौकर की तरह श्री अनंत पद्मनाभ स्वामी को आत्मसमर्पण कर दिया था।


मार्तंड वर्मा
अनिज़म तिरुनल वीरबाल मार्तंड वर्मा को अधिक लोकप्रिय मार्तंड वर्मा के रूप में जाना जाता है । वो १७२९ से १७५८ में अपनी मृत्यु तक त्रावणकोर के राजा थे। उन्हें १७४१ में कुलाचल की लड़ाई डच के साथ के दौरान यूरोपीय सशस्त्र बलों के राजाओं की पिटाई के लिये जाना जाता है। उन्होंने राज्य की पारंपरिक क्षेत्र से हटकर, त्रावणकोर राज्य के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।


आधुनिक तिरुवनंतपुरम का उदय (स्थानीय भाषा में तिरुवितमकूर) १७२९ में त्रावणकोर रियासत के संस्थापक शासक के रूप में मार्तंड वर्मा का परिग्रहण के साथ शुरू हुआ था। अपने शासनकाल के दौरान साल १७४५ में, मार्तंड वर्मा ने राज्य की राजधानी पद्मनाभपुरम को तिरुवनंतपुरम स्थानांतरित कर दिया था।


तब से अब तक तिरुवनंतपुरम शहर में संस्कृति, शिक्षा, सशस्त्र प्रशिक्षण और आदि कला जैसे सभी क्षेत्रों में विस्तार हुआ है।


नायर ब्रिगेड
नायर ब्रिगेड के उल्लेख के बिना मार्तंड वर्मा की सफलता की कहानी अधूरी रहेगी। इस क्षेत्र में योद्धा नायर समुदाय के थे। और नायर ब्रिगेड त्रावणकोर के तत्कालीन साम्राज्य की सेना थी और त्रावणकोर राज्य की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार थे। राजा मार्तंड वर्मा के निजी अंगरक्षक "तिरुवितमकूर नायर पट्टलम" कहा जाता था। (त्रावणकोर नायर सेना)।


आधुनिक त्रावणकोर के आधुनिकीकरण में श्री मार्तंड वर्मा ही निर्माता थे, तथा उसमें नायर ब्रिगेड ने अहम भूमिका निभाई थी। सेना के आधुनिकीकरण के कारण ही, उन्होंने डच कमांडरों को पराजित किया था। इस सेना के साथ मार्तंड वर्मा ने क्षेत्र का विस्तार जारी रखा, और १७४६ में कोच्चि तक सभी रियासतों पर कब्जा कर लिया था।


नायर ब्रिगेड ईस्वी १७९१ में मैसूर के टीपू सुल्तान के हमलावर सेना के खिलाफ राज्य की रक्षा करने में सफल रही थी। नेदुम्कोट्टा के समीप, टीपू सुल्तान ने त्रावणकोर नायर ब्रिगेड के साथ युद्ध में अपनी तलवार खो दी थी। 1818 में त्रावणकोर सेना को त्रावणकोर नायर ब्रिगेड के रूप में पुनर्गठित किया गया था।


१८१८ के पूर्वाध में, त्रावणकोर सेना को आधिकारिक तौर पर, त्रावणकोर नायर ब्रिगेड के रूप में भेजा गया था, जिसमें केवल नायरों को ही इस ब्रिगेड में भर्ती किया गया था। बाद में, इकाई का विस्तार किया गया था और कई उप इकाइयों का गैर-नायरों के साथ भी गठन किया गया था। लेकिन नायर ब्रिगेड नाम परिवर्तित रहा। शांति के दौरान सेना को कई सेवाओं में शामिल किया गया था।


नायर ब्रिगेड का मुख्यालय, पालयम
त्रावणकोर राज्य की राजधानी को राजा मार्तंड वर्मा द्वारा पद्मनाभपुरम से तिरुवनंतपुरम के लिए स्थानांतरित कर दिया था, तभी नायर ब्रिगेड को भी स्थानांतरित कर दिया था। प्रारंभ में, मुख्यालय पुरानी राजधानी से नई राजधानी में स्थानांतरित कर दिया था। तदोपरान्त यह कोल्लम में स्थानांतरित कर दिया था और बाद में तिरुवनंतपुरम में वापस लाया गया। तिरुवनंतपुरम में जहाँ मुख्यालय था उस जगह को आज "पालयम" के नाम से जाना जाता है। मलयालम में "पालयम" का मतलब छावनी होता है।


पालयम में जिस इमारत में त्रावणकोर नायर ब्रिगेड का मुख्यालय स्थित था वो अब केरल विधायी संग्रहालय है।


जब नायर ब्रिगेड पद्मनाभपुरम से तिरुवनंतपुरम के लिए स्थानांतरित हुई, तो वो नई राजधानी में, अपने साथ पुजा के लिये कुछ देवता ले आये थे और उन्हीं में से एक देवता श्री हनुमान जी भी थे।


श्री हनुमान मंदिर पालयम
पहले जहाँ छावनी थी उस क्षेत्र को "पालयम" के रूप में जाना जाता था। वर्तमान में छावनी को कहीं और स्थानांतरित कर दिया। लेकिन नाम पल्लयम क्षेत्र के लिए बना रहा, और अब यह शहर का दिल है। केरल राज्य विधानमंडल विधानसभा, और विधानमंडल के सदस्यों का छात्रावास, मुख्य सचिवालय आदि आज भी पालयम का मुख्य आकर्षण हैं। कहीं और छावनी के स्थानांतरण के साथ नायर ब्रिगेड के मुख्यालय को भी स्थानांतरित कर दिया था। वहाँ पालयम में, एक चीज जो अभी भी है, वो केवल सेना के द्वारा बनाया गया, श्री हनुमान जी का एक छोटा सा मंदिर।


श्री हनुमान मंदिर पालयम तिरुवनंतपुरम
वहाँ एक छोटा सा मंदिर है, जहाँ मार्तंड वर्मा के योद्धाओं ने श्री हनुमान भगवान की स्थापना की थी और पूजा की थी, लेकिन अब भी कुछ विस्तार के साथ यह मंदिर बिलकुल वैसा ही है। यह मंदिर पूर्वामुखी है।


शीर्ष पर एक मोर्टार कला के द्वारा श्री हनुमान जी को श्री राम और श्री सीताजी की पूजा करते हुये दिखाया हुआ है, जोकि भक्तों का स्वागत करता है। एक पीपल का पेड़ और पारंपरिक पताका उस स्थान पर है। एक संकेत पटल इंगित करता है, कि मंदिर का प्रबंधन "त्रावणकोर देवास्वोम मंडल" द्वारा किया जाता है। जैसे आप प्रवेश करतें हैं, तो एक बड़ा लंबा बरामदा दिखाई देता है जिसके दोनों तरफ कार्यालयों की कतारें हैं। अंत में मुख्य मंदिर के सामने एक खुली जगह के बीचोंबीच एक भव्य पुन्नाग [punnāga] का पेड़ है। मुख्य मंदिर के दो प्रवेश द्वार हैं, और दोनों द्वारों के सामने दो बड़े लैंप हैं।


दरवाजे में प्रवेश करते ही, मुख्य मंदिर के प्रमुख मार्ग के दोनों तरफ चबूतरा है। भक्तगण बैठकर श्री रामायण, श्री विष्णु और श्री हनुमंत सहस्त्रनाम उच्चारण करते हैं। बाईं ओर के चबूतरे के अंत में एक बरगद का पेड़ है, जिसकी झूलती हुई शाखाएँ सारी खुली जगह को और मुख्य सन्निति को छाया प्रदान करता है।


वहाँ सन्निति के बाईं तरफ पुन्नाग [punnāga] का पेड़ है जिस्की शाखाएँ श्री हनुमान जी की मुख्य सन्निति को छू रही हैं। इस पेड़ का आशचर्य यह है कि पेड़ पर श्री हनुमान जी की आकृति प्राकृतिक रूप से उभरी हुई है, और उसकी भी भक्तों द्वारा पूजा की जाती है।


अब मंदिर में दो मुख्य सन्निति हैं। बाईं पक्ष की सन्निति पर श्री गणेश और दायें पक्ष की सन्निति पर श्री हनुमान विराजमान हैं।


श्री हनुमान मंदिर
यहाँ श्री हनुमान जी खड़े मुद्रा में देखाई देतें है। मुर्ति बहुत अनोखी है और पहली नजर में ही हमें रोमांचित कर देती है। पांच फुट लंबी श्री हनुमान जी की आकर्षक मुर्ति का सौंदर्य देखकर भक्तों की आँखें मंत्र-मुग्ध हो जाती हैं। उनका मनोहर चेहरा थोड़ा बाई ओर झुका हुआ है, और एक रजत मुकुट उनके सिर पर है।


प्रभु की आंखों की चमक भक्तों पर 'करुणा' बरसा रही हैं। वो कानों में कुडंल पहने हुए हैं। यह प्रासंगिक ही है कि नरसिंह भगवान की तरह आगे निकले हुये दाँत, हनुमान जी के रूप को शोभायमान बना रहें हैं। वो गले में कुछ गहने पहने हुए हैं। प्रभु का दाँया हाथ अभय मुद्रा में भक्तों को आशीर्वाद प्रदान कर रहा है। प्रभु का बाएं हाथ, बाईं जांघ पर आराम अवस्था में है। उनकी बाईं जांघ के पास एक गदा रखी हुई है। उनके कमरबन्द में एक छोटा सा चाकू है। तथा उनकी पूछं एक छोटे से घुमाव के साथ, उनके पैरों के पास है।



अनुभव
जो श्री हनुमान भगवान पूरे ब्रिगेड को हिम्मत देतें थे, निश्चित ही वो हमारे साहस को बढ़ातें है, और जीवन में चुनौतियों का सामना करने के लिए पर्याप्त साहस प्रदान करतें हैं।

 

 

 

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

 

ed : Ocober 2015


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