श्री यलगुरेश [हनुमान] मंदिर,
यलगुर, जिला बीजापुर, कर्नाटक

डा. कौशल्या, बंगलुरू / रोहतक

 

यलगुर
कृष्णा नदी पर अल्मत्ती बांध, कर्नाटक के बीजापुर जिले में स्थित है और अल्मत्ती गांव पन बिजली पैदा करने वाले स्थानों में से एक है। यह प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है और कई लोग इस बांध को देखते हुये जाते हैं जब भी वो राष्ट्रीय राजमार्ग सं.13 पर मंगलौर [कर्नाटक] और शोलापुर [महाराष्ट्र] के बीच से गुजरते हैं। बांध बगेवाड़ी के अल्मत्ती गांव में स्थित है।


बीजापुर तालुका
इस स्थान के बहुत पास यलगुर नाम का गांव है। कृष्णा नदी के साथ-साथ, नदी पार करने पर यलगुर गांव आ जाता है जोकि बीजापुर मुद्देदिहल तालुका में पड़ता है। इस गांव के बारे में केवल बस इतना खास कि यहाँ एक प्रसिद्ध श्री हनुमान मंदिर है। गाड़ी से जाने पर, यलगुर गांव तक पहुंचने के लिए राजमार्ग सं. 13 से दो-तीन किलोमीटर सफर करना पड़ता है। यदि बस से जायें, तो आपको राष्ट्रीय राजमार्ग सं.13 पर स्थित निद्गुन्डी पर उतरना पड़ेगा, और फिर यलगुर गांव तक पहुंचने के लिए सहभागी ऑटो करके जाना होगा।


मंदिर
गांव में प्रवेश करते ही, मंदिर की तीन स्तरीय प्रधान शिखर आपका स्वागत करती है। और मंदिर में आपका स्वागत है। दूर से ही प्रधान शिखर के प्रथम स्तर पर योग आसन मुद्रा में श्री हनुमान की मोर्टार प्रतिमा देख सकते हैं। यहाँ कुछ और मूर्तियां प्रधान शिखर की शोभा बढ़ातीं हैं। प्रधान शिखर के प्रवेश द्वार से ही प्रभु के दर्शन हो जाते हैं।


जैसे ही आप प्रधान शिखर से गुजरते हैं, एक बड़ा सभा-भवन टिन की चादरों से ढ़का हुआ तथा टाइलों का फर्श आपका स्वागत करता है। सभा-भवन पार करने पर, एक बड़ा मंडप है, इस मंडप के शुरू में एक बड़ी ऊँची मेहराब है। मेहराब को अच्छी तरह से सजाया है तथा दोनों ओर दो द्वारपाल शोभा बढ़ा रहे हैं। इस मेहराब के बीचों-बीच दो हाथी हैं, जोकि मंडपम के लिए रास्ता दिखाते हैं।


मंडपम के ऊपर मेहराब के बीचों-बीच श्री राम दरबार दिखाया गया है। बाईं ओर भगवान श्री हनुमान संजीवीनी बुटी वाला पर्वत ले जाते हुए दिखाया गया है और दाईं तरफ श्री हनुमान, शिव लिंग ले जाते हुए दिखाया गया है। यह मंडप जोकि तीस फीट से तीस फीट के लगभग है, गर्भग्रह की ओर जाता है।


श्री यलगुरेश विमनं
इस परिसर के चारों ओर परिक्रमा लगाने के लिए चौड़ी जगह है। इस परिसर के बाईं ओर पर कार्यालय और रसोई है, यहाँ रसोई में प्रभु के लिए प्रसाद तैयार किया जाता है। प्रभु की परिक्रमा करते हुये, आप मुल गर्भग्रह में विमनं देख सकते हैं जोकि सामान्य रूप से महाराष्ट्र के मंदिरों में पाई जाने वाली शैली में है। परिसर की दिवारें श्री माधवाचार्या की श्रीमद रामायण के दृश्यों के साथ चित्रित हैं।


पुराने स्थल का परिचय
श्री रामचन्द्रजी ने अयोध्या से निर्वासन पर, अपने वनवास काल में भारत भर में भम्रण किया था। चौदह वर्षों के वनवास काल में उन्होंने उत्तर, पूर्व, मध्य, पश्चिम और भारत के तत्कालीन दक्षिण को भी देखा था। इसी भम्रण के दौरान भगवान राम यहाँ भी आये थे जिसे अब "यलगुर" के नाम से जाना जाता है। यह जगह कृष्णा नदी के तट पर स्थित है। त्रैतायुग में यहां भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान कुछ समय बिताया था।


इस जगह के सात गांवों को मिलाकर यलगुर पुकारा गया, जोकि ऎळू + ऊरू से "यलगुर" [सात+गांव] नाम प्राप्त हुआ। पुराणों में नामित सात गांव नागचमपिका, चंद्रागिरी, आललतिने, यलगुरू [यलगुर], कचनाकुट्टी, भुउटीहला, मासुटी हैं। भारतवर्ष में गांव के देवता के रूप में प्रत्येक गांव में श्री हनुमान के लिए एक मंदिर है। वहीं यह दिलचस्प बात है कि इन सात गांवों में हनुमान के लिए यलगुर गांव में केवल एक ही मंदिर है। ऐसा श्रीराम की अगुवाई में हुआ था।


कलियुग
वर्तमान कलियुग के दौरान यह क्षेत्र जब नास्तिक लोगों द्वारा मूर्ति पूजा के विरोध में, भारी तनाव में था, तब हिंदू देवताओं और मंदिरों का अस्तित्व दांव (परीक्षण) पर था। तब यह बड़ों और पुजारीओं द्वारा पूजा के देवताओं के लिये दिवारें खड़ी करके छलावरण किये गये थे।


उसी तरह, इस समय के दौरान, गोविन्दराज केरे (अब गोनी केरे के रूप में जाना जाता है) गांव में भगवान श्रीहनुमान के लिए एक मंदिर था। इस गांव के उत्तर-पश्चिम में श्री वेंकटेश्वर [श्री बालाजि] और श्रीदेवी के लिए एक मंदिर है। तत्कालीन यह प्रचलन था कि सभी देवताओं को नास्तिकों से छिपाने के लिये एक पत्थर की दीवार का निर्माण कर दिया जाता था। भगवान हनुमान को श्री वेंकटेश्वर मंदिर के पुजारी ले आये थे। सभी देवताओं को एक पत्थर की दीवार के निर्माण से, मुखावरण कर दिया गया था।


जब क्षेत्र में शांति लौट आई और लोगों ने महसूस किया है कि देवताओं के तोड़ने का खतरा अब नहीं हैं। तो लोगों ने पूजा करने के लिए देवताओं को वापस लाने के बारे में सोचा। तब जो पुजारी भगवान हनुमान की पूजा करता था, उसे भगवान ने देवताओं की पुजा के लिये, देवताओं को वापस लाने का दिशा-निर्देश दिया। पुजारी ने पूजा करने के लिए भगवान हनुमान को लाने के लिए पहल की। भगवान हनुमान के अनावरण के समय पुजारी से अनजाने में प्रतिमा टूट गई। पुजारी को इस कारण बहुत शर्मिंदगी हुई थी। तथा बिना साधन और उचित देखभाल के, काम की शुरूआत होने के कारण पुजारी ने उदास महसूस किया था।


संबंधों का आश्चर्य
उसी रात को पुजारी को फिर से टूटे हुये भगवान मूर्ति को यलगुर लाने के लिए दिव्य निर्देश हुये, "और बताया कि टुकड़ों को यथावत जोड़कर एक बंद कमरे रख दें। सात दिनों तक पुजारी को बाहर से ही पूजा-अर्चना करनी है और इस अवधि के दौरान दरवाजे खोलने नहीं हैं।" पुजारी ने भी टूटे हुये यलगुर [हनुमान] भगवान मूर्ति के टुकड़ों को ठीक प्रकार से जोड़कर दिव्य निर्देशानुसार रख दिया था। किसी भी इंसान के तरह पुजारी को भी जानने की जिज्ञासा थी, कि बंद दरवाजों के पीछे क्या हो रहा था। जिज्ञासा से उभर आने के बाद, पुजारी ने यलगुर भगवान की एक झलक पाने के लिए दरवाजा खोला। आश्चर्य से पुजारी ने देखा कि यलगुर भगवान के टुकड़े जुड़ चुके थे। परन्तु पर्यवेक्षण करेने पर पाया कि नीचे के हिस्सों में टुकड़ों का जुड़ना अभी बाकी था।


कुछ दिनों बाद पुजारी को देवीक आदेश हुआ कि प्रभु की पुजा कृष्णा नदी के जल से स्नान [अभिषेक] इत्यादि करवाने के उपरांत होनी चाहिये। उस समय के महान पंडितों से सलाह मशवरे के उपरांत भगवान हनुमान की प्राण प्रतिष्ठा भी की गई थी।


श्री यलगुरेश
आजकल भगवान को श्री यलगुरेश्वरा के नाम से जाना जाता है और सात गांवों के लिये श्री यलगुरेश प्रभु श्री राम के आदेशानुसार यलगुर गांव में स्थापित हैं। आज भी मुर्ति के कुछ हिस्से जुड़े हुये नहीं हैं। इसके बाद मराठा शासन के दोरान, श्री बाजी राओ ने ४८० एकड़ जमीन, श्री यलगुरेश प्रभु की रोजाना ठीक प्रकार से पुजा हेतु दान में दी थी। जोकि आज भी मंदिर के पास है।


श्री यलगुरेश भगवान
भगवान हनुमान यलगुरेश देवता के रूप में, आँखों को आनंद प्रदान करते हैं। भगवान यलगुरेश देवता की मनभावन विशाल प्रतिमा, एक अर्द्ध शिला रूप में लगभग सात फुट लम्बी है। चांदी से बना प्रभावलि भगवान विष्णु के दसावतार चित्रण नक्काशियों के साथ सजी है। प्रज्वलित बड़ी आँखों ने, प्रभु के प्रसन्न वदन को और अधिक सुंदर बना दिया है। प्रभु के विशाल कुंडल कंधों को छू रहे हैं। प्रभु दायें हाथ में केयूरम् और कंगन पहने हुये, ’अभय मुद्रा' के साथ अपने सभी भक्तों को आशीर्वाद दे रहें हैं। प्रभु बायें हाथ में केयूरम् और कंगन पहने हुये, प्रभु बाईं जांघ के साथ सोवगन्दिका फूल की प्रातिपदिका (पतली डंडी) पकड़े हुये हैं। प्रभु का विराट वछ-स्थल पेंडेट और सुंदर मालाओं से सजा हुआ है। उसका बायें पैर के नीचे एक दानव को कुचलते हुये दिखा गया है। प्रभु के लंबी पूंछ सिर के ऊपर से होती हुई प्रभु के बाएं पैर के पास जमीन को छू रही है।


भगवान यलगुरेश की पुजा
दिव्य निर्देशन में जैसा पहले पुजारी ने शुरू किया था, आज भी पुजारी कृष्णा नदी पर जाता है, स्नानोपरान्त अभिषेक कराने के लिये कृष्णा नदी का जल लातें हैं। दोपहर में यह अभिषेक किया जाता है, तथा इसे महापुजा कहा जाता है। इस महापुजा पञ्चामृत् अभिषेक के दौरान, दूध अभिषेक भी प्रभु यलगुरेश को किया जाता है। अभिषेक के बाद, प्रभु को कुमकुम की बौछार की जाती है, तदोपरान्त गहनों और फूलों से श्रृंगार किया जाता है। प्रभु को नैवेद्यम अर्पित किया जाता है और बाद में महा-आरती होती है। इस पूजा में बहुत सारे भक्तगण भाग लेते हैं।


श्रीराम नवमी, गुडी पणवा [मराठि नववर्ष], हनुमान जयंती इत्यादि उत्सव इस मंदिर के वार्षिक समारोह में शामिल हैं। हनुमान जयंती के दिन प्रभु को ढॊलॊत्स्व किया जाता है। कार्तिक माह में विशेष पूजा आयोजित की जाती हैं, और हजारों श्रद्धालुओं को अन्न्दान दिया जाता है।


उत्तरादीमठ की गोशाला
वहाँ श्री उत्तरादीमठ द्वारा एक गोशाला का रख-रखाब किया जाता है। जोकि श्री यलगुरेश मंदिर के पीछे है। वर्तमान में गौशाला के पास दो नलकूप तथा चार एकड़ भूमि है। इस गोशाला में लगभग 35 गायओं को सुरक्षा प्रदान की जा रही है, तथा उनका रख-रखाब किया जाता है।


अनुभव
इस क्षेत्र की यात्रा करने से श्रद्धालुओं के जीवन में महान चीजों का आना निश्चित है। भगवान यलगुरेश के दर्शन और उनके कटाक्ष से, भक्तों के जीवन में चमत्कार करते हैं।

 

 

 

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

 

ed : April 2015


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