झूल श्री मुख्यप्राण [हनुमान] मंदिर,
कडप्पा, आंध्र प्रदेश

श्रीमती अकिला रघुरमन, कडप्पा*

 

कुडप्पा उर्फ कडप्पा
कडप्पा चोल, काकतीय राजाओं द्वारा शासित था और १४ वीं सदी के उत्तरार्ध में फिर यह विजयनगर साम्राज्य के आधीन आ गया। यह क्षेत्र वर्ष १५६५ में मीर जुमला दवारा नायकों को हरा कर, गोलकुंडा के नवाब के तहत लाया गया था। १८ वीं सदी में, ब्रिटिश ने कडप्पा को नियंत्रण में ले लिया था। शुरुआत के कुछ वर्षों को छोड़कर, १८ वीं सदी में कडप्पा, मयाना नवाबों की गद्दी था। लेकिन ब्रिटिश कब्जे के साथ ही, मेजर मुनरो प्रिंसिपल कलेक्टर के आधीन, यह चार अधीनस्थ ज़िल्लघीशों में से एक मुख्यालय बन गया था।


कडप्पा शहर, पेन्नार नदी से आठ किलोमीटर दक्षिण में स्थित है, शहर नाल्लमाला और पालकोंडा पहाड़ियों से तीन तरफ से घिरा हुआ है। तेलुगू में कडप्पा का अर्थ प्रवेश या द्वार है। जोकि शब्द "गड्डपा" से उत्पन्न हुआ था। श्री शेषशैल के भगवान श्री वेंकटेश्वर के दर्शन और आशीर्वाद के लिए, कडप्पा ही प्रवेश द्वार था, और इसलिए देवुनी कडप्पा के रूप में जाना जाता था। बाद में कुडप्पा के रूप में जाना जाने लगा था।


कडप्पा और हनुमान
हमने कडप्पा के पास वेम्पल्ले गांव में चित्ताकर्षक हनुमान मंदिरों में से एक को देखा है। पालकोंडा पहाड़ियों द्वारा गठित घाटी में लोकप्रिय गांदी (Gandi) क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। कुडप्पा शहर में भगवान हनुमान का एक प्राचीन मंदिर ब्राह्मण मार्ग पर स्थित है। मंदिर रेलवे स्टेशन और केंद्रीय बस अड्डे से लगभग तीन किलो मीटर की दूरी पर है, और पुराने बस अड्डे से एक किलो मीटर की दूरी पर है।


झूल श्री मुख्यप्राण हनुमान मंदिर, कुडप्पा, आंध्र प्रदेश
मंदिर की भव्य एवँ सुंदर संरचना पश्चिम मुखी है, जिसका मुख्य गर्भग्रह तीन मंजिला है, तथा शीर्ष पर पांच क्लश हैं। वहाँ बाईं तरफ भगवान हनुमान की तसवीर है, और दाईं तरफ राघवेन्द्र सरकार दिखाई देतें हैं। वहाँ अधिक मूर्तियां नहीं हैं सिवाये संत श्री माधवाचार्य के जोकि ऋषि व्यास के सामने बैठे हैं, और दो दवारपाल हैं। जैसे ही आप मुख्य गर्भग्रह में प्रवेश करतें हैं वहाँ एक खुली जगह है। और दाईं तरफ कुआं है, जहाँ से अभिषेक के लिए शुद्ध पानी लिया जाता है। कुएँ के पास एक छोटा सा तुलसी का पौधा है, जिसकी मंदिर में प्रतिदिन पूजा होती है।


हनुमान जी के मंदिर में प्रवेश से पहले एक ढका हुआ मार्ग है। तदोपरान्त आप विशाल आयताकार कक्ष में भगवान की मूर्ति के सामने आ जाते हैं। मंदिर के दोनों तरफ केले के पेड़ो पर केलों के गुच्छे लटके हुये हैं, जोकि इस जगह को अति मनमोहक और मंगलकारी बना रहें हैं।


किंवदंती
प्रभु के दर्शन करने से पहले, आईये हम इस मंदिर के अस्तित्व की प्रचलित कथा को जाने। जब तक यानी, वर्ष १५६५ के बाद और १८ वीं सदी से पहले कुडप्पा का शासन निजामों के अधीनस्थ था। इस अवधि के ही दौरान सत्तारूढ़ नवाब को भगवान हनुमान ने सपने में निर्देश दिये कि यथोचित पूजा के लिए उनको स्थापित किया जाये। दिव्य दिशानुसार, नवाब ने पेन्नार नदी के किनारे प्रभु का विग्रह और नहरों की व्यवस्था के लिए खोज शुरू कर दी। नवाब ने पेन्नार नदी की बीच धारा में स्थान का चयन किया, जहाँ पर धोबीयों और अन्य लोगों द्वारा कपड़े धोने के लिए एक पत्थर का इस्तेमाल किया जाता था। पत्थर को पलट्ने पर भगवान हनुमान का विग्रह अर्द्धशिला रूप में मिला, जिसने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था।


तब नवाब ने वर्तमान जगह पर नियमानुसार विग्रह स्थापित किया था। तथा मंदिर का निर्माण करवाया था। प्रतिदिन पुजा और मंदिर की देख-रेख के लिये वह पदकंडला गांव से कुछ माधवा ब्राह्मणों को लाया था, और उन्हीं को मंदिर सौंप दिया था।


लेकिन भगवान के भक्त के रूप, वह भगवान को प्रसाद के साथ उनके चित्ताकर्षण के लिए मंदिर में हर रोज आता था। मंगला आरती के दौरान अपने उद्वेग में उसे लगता था कि भगवान हनुमान भी खुशी खुशी में झूल रहें हैं। तब से इस क्षेत्र के प्रभु झूल-हनुमान कहलाये जाने लगे। हिंदी में झूलना का मतलब हिलना या झूमना होता है। तभी से इस क्षेत्र के भगवान का नाम झूल हनुमान पड़ गया।


यह भी कहा जाता है कि ब्रिटिश कलेक्टर मेजर मुनरो का प्रभु हनुमान के दर्शनार्थ मंदिर के दौरे के दौरान, इसी तरह का अनुभव था।


इस क्षैत्र के भगवान
इस क्षेत्र के प्रभु हनुमान, देखने में तेजस्वी और विशालकाय हैं। भगवान पश्चिम मुखी हैं तथा दक्षिण की ओर चलते हुये दिखाई देतें हैं। उनका उठा हुआ दाहिना हाथ, भक्तों को अभय प्रदान करता है। उनका बायां हाथ सुंदर सौगंधिगा फूल पकड़े हुये, कमर पर है। वो कुडंल पहने हुये हैं। उनकी पूँछ सिर से ऊपर उठी हुई तथा अंत में मुड़ी हुई है। पूंछ के अंत में कोई घंटी नहीं है। जैसाकि सामान्य रूप से व्यासराजा प्रदिष्ट में पाया जाता है।


उनके बाएं कंधे से पटका एक छोटी सी गांठ के साथ लटक रहा है। उन्होंने सभी गहने पहने हुये हैं जैसे कि हाथों मे केयूरं और पैरों में पैंजनी । उनके गले में तीन विभिन्न प्रकार की मालाएँ सुशोभित हैं। उनकी मूंछों से पता चलता है, कि वो एक महान योद्धा और महावीर हैं। भगवान की आंखें अत्यंत चुंबकीय वैशिष्टय हैं, जोकि बहुत करुणा और दया बरसा रही हैं। पुजारी ने बताया कि प्रभु के मंगला अभिषेक के दौरान प्रभु के शरीर पर बालों को देख जा सकता है।


पुजाएँ
प्रतिदिन पूजा के अतिरिक्त, दशहरे के दिनों में भगवान हनुमान की विशेष पूजा की जाती हैं। तथा यहाँ हनुमान जयंती और माधव नवमी को महोत्सव मनाया जाता है।


*लेखक एलआईसी, कुडप्पा में एक अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं।


अनुभव
आप इस प्राचीन मंदिर में भगवान झूल-हनुमान जी के दर्शन के लिये आयें। दर्शनोपरान्त आप पायेंगे कि आपका और आपके परिवार का दिल खुशी और उल्लास से झूलने लगेगा।

 

 

 

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

 

ed : november 2015