श्री वीर अंजनेय स्वामि मंदिर, अरगोड़ा, चित्तूर, आंध्र प्रदेश

श्री जी वी आर गुप्ता, कण्नमंगलम, वेल्लोर


रामायण के दौरान लंका में युद्ध

लंका के राक्षस राजा रावण को अपने भाई श्री विभीषण सहित कई लोगों ने सलाह दी थी कि वे श्री सीता देवी को लौटा दे और श्रीराम कि शरण मे जाए (शरणागतम)। उसने लिए सभी अच्छे परिषद के सुझाव को नही सुन और रावण ने श्री सीता देवी को वापस करने के लिए कोई झुकाव नहीं दिखाया और वास्तव में ऐसा नहीं करने के लिए दृढ़ता दिखाई। श्री राम और रावण के बीच अपरिहार्य युद्ध हुआ, जिसमें श्री राम को बंदर और भालू योद्धाओं ने सहायता की और रावण ने माया शक्ति और राक्षस योद्धाओं की मदद ली।


युद्ध के दौरान, रावण ने अपने कई सक्षम योद्धाओं को खो दिया था, और श्री राम का पक्ष जीत का चेहरा देख रहा था। तब भी रावण ने अपनी घमंड और श्री सीता देवी के अपहरण में निराधार गर्व के कारण आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता महसूस नहीं की। वह इंद्रजीत [मेघनाथ] को युद्ध लिए भेजता है, उसका एकमात्र बेटा अब उसके पीछे रह गया है। वह इंद्रजीत को युद्ध के मैदान के लिए आगे बढ़ने का निर्देश देता है और उसे जीत के लिए आशीर्वाद देता है।


युद्ध के मैदान में इंद्रजीत

श्री वीर अंजनेय स्वामि मंदिर अरगोड़ा,  चित्तूर आंध्र प्रदेश

रावण का पुत्र जिसने देवों के नेता भगवान इंद्र को युद्ध में जीता था, उसे इंद्रजीत का नाम मिला , जिसका अर्थ है जिसने इंद्र को जीत लिया था। इंद्रजीत सभी शस्त्रो के साथ युद्ध क्षेत्र में प्रवेश करता है; अपने आडम्बर से मेल खाते हुए वह युद्ध में भी कुशल था। दूसरी ओर, श्री राम को श्री हनुमान कंधे पर उठाकर और श्री लक्ष्मण को अंगद कंधे पर उठाकर ले के जा रहा था। नील को श्री राम ने पीछे बल बन के रहने को कहा था। जब इंद्रजीत का सामना श्री राम और लक्ष्मण से होता है, जिस कौशल के साथ ये दोनों लड़ रहे थे, उसने उसे आश्चर्यचकित कर दिया। लेकिन अपने दिमाग के पीछे वह इन दोनों द्वारा अपने भाइयों और प्रिय चाचाओं की हत्या के बारे में सोच कर बदला लेने का विचार किया। लक्ष्मण के साथ एक लंबी लड़ाई के बाद, इंद्रजीत अपनी माया शक्ति के माध्यम से मैदान छोड़ देता है। सूर्यास्त के समय , दिन के युद्ध के प्रभावों का जायजा लेने के लिए लक्ष्मण को छोड़कर श्री राम युद्ध के मैदान से चले जाते हैं। महल लौटने पर, इंद्रजीत महेंद्र को युद्ध के मैदान में भेजता है।


युद्ध जारी है

रावण के पक्ष को महेंद्र और श्री राम के पक्ष को लक्ष्मण, लड़ाई जारी रखते है। हनुमान अगंबन से लड़ रहे थे। अगंबन को मारने के बाद, हनुमान लक्ष्मण की सहायता के लिए जाते हैं जो युद्ध क्षेत्र में पूरी तरह से रावण के योद्धा सैनिकों से घिरे हुए थे। सलाह के तहत, लक्ष्मण ने पाशुपतास्त्र का मंत्र जाप किया, जिससे रावण के सभी बल मारे गए।


ब्रह्मास्त्र का उपयोग

पाशुपतास्त्र के उपयोग की खबर रावण और इंद्रजीत को जाती है। इंद्रजीत सोचता है कि यह लक्ष्मण पर ब्रह्मास्त्र का उपयोग करने का समय है, और युद्ध के मैदान में जाता है। वह अपनी माया के माध्यम से अदृश्य रहता है और महेंद्र को इंद्र की तरह देखता है और वानरों से लड़ता है। इंद्र को युद्ध करते देख वानरों और लक्ष्मण को आश्चर्य हुआ। उस समय इंद्रजीत ने श्री राम के योद्धाओं पर ब्रह्मास्त्र छोड़ा।


ब्रह्मास्त्र का प्रभाव

ब्रह्मास्त्र के प्रभाव का वर्णन करने के लिए एक सरल शब्द अंधकारपूर्ण है। कवि कम्बन का कहना है कि लाखों और करोड़ों बाणों ने लक्ष्मण को घेरा था, हनुमान पर लाखों तीरों था, हजारों तीरों को अंगद, नील आदि को मारा था। इंद्रजीत युद्ध क्षेत्र में घटनाओं का वर्णन करने के लिए रावण के पास जाता है।


श्री राम जो युद्ध के मैदान से दूर थे, अपने सभी पुरुषों को खोजने के लिए मैदान में प्रवेश करते हैं जो ब्रह्मास्त्र के शिकार हो गये थे । दृष्टि गंभीर और विषादयुक्त थी, और वह एक से दूसरे योद्धाओं के पास जाता है। वह लक्ष्मण को बाणों के ढेर के बीच गिरता हुआ पाता है, और अपने प्रिय भाई कि इस दशा को देख नहीं पाता। दुःख से रोता है और जल्द ही वह बेहोश हो गया।


रावण का एक दूत इसे देखता है और जाता है और रावण को संदेश देता है कि राम और लक्ष्मण दोनों ब्रह्मास्त्र के शिकार हो गया है। इसे सत्य मानते हुए, रावण आनन्दित होता है, अशोक वाटिका में जाता है और पुष्पक विमान द्वारा सीता देवी को लाता है और युद्ध के मैदान में गिरे हुए भाइयों को दिखाता है, जिससे श्री सीता देवी को असहनीय पीड़ा होती है।


हनुमान और विभीषण

ब्रह्मास्त्र से हुए नुकसान का आकलन करने के लिए श्री विभीषण जो कि एक चेरंजीवी हैं, युद्ध के मैदान में आते हैं। सबसे पहले हनुमान को देखा और उन्हें आधे बेहोशी की हालत में देखा। हनुमान को प्राथमिक चिकित्सा देने के बाद, दोनों लंबे समय तक जीवित जाम्बवान की खोज में निकल जाते हैं। श्री जाम्बवान जो कि आधे सचेत थे, विभीषण को देखकर हनुमान के बारे में पूछते हैं। हनुमान को देखकर वह आनंदित होकर रो पड़ा और बोले "हम सब उठेंगे और उठेंगे"। श्री जाम्बवान फिर औषधीय जड़ी बूटी के बारे में बताते हैं जो लक्ष्मण को पुनर्जीवित कर सकती है। वह जड़ी बूटी के ठिकाने का वर्णन करता है और उस जड़ी बूटी के बारे में बताता है जो जीवन को पुनर्जीवित कर सकती है, जड़ी बूटी जिसे कटे हुए अंगों को ठीक करने के लिए लगाया जा सकता है, जड़ी बूटी जो शरीर को ठीक कर सकती है। वह हनुमान को निर्देश देता है कि वे नीले पहाड़ में जड़ी बूटियों के पीछे जाएं।


औषधीय पर्वत [संजीवनी पर्वत]

जड़ी बूटी की आवश्यकता और अत्यावश्यकता को हनुमान ने समझा और एक विशाल आकृति लिया और आकाश पर छलांग लगा दी, जिससे समुद्र पीछे छूट जाता है। उसने समुद्र, भारतवर्ष, हिमालय पर उड़ान भरी। वह सभी देवताओं और ईश्वरो को प्रार्थना करता है, और उनका स्वागत करते हुए औषधीय पर्वत [संजीवनी पर्वत] पर पहुँचता है। कवि कम्बन का कहना हैं कि हनुमान जो भविष्य के ब्रह्मा है वो रंग में सुनहरे थे; मृत्युहीन चिरंजीवी थे उन्होने नीले पहाड़ को देखा। यह इतना काला था कि ऐसा लग रहा था जैसे अंधेरे ने इसमें पनाह ले ली हो। संजीवनी पर्वत पर पहरा दे रहे देवों ने उनसे उनके आने का यहा कारण पूछ। जब उनके यहॉ आने का कारण बताया गया, तो उन्होंने केवल आवश्यक जड़ी-बूटियों के उपयोग के बाद हनुमान से पर्वत को मूल स्थान पर लौटाने का अनुरोध किया।


अब हनुमान पर्वत को उखाड़ते हैं और भारतवर्ष से गुजरते हुए, इसे लंका में युद्ध के मैदान में ले जाते हैं और लक्ष्मण के जीवन को बचाते है। कई वानरों के जीवन को वापस लाता है, जिन्होंने जान गंवा दी; वानरों के अंगों को वापस लाया जो अंग खो गए, वानरों के सभी घावों को ठीक कर दिया। बस सरल और एक तेज़ कार्य द्वारा हनुमान ने औषधीय पर्वत[संजीवनी पार्वत] को अपने मूल स्थान पर वापस रख दिया जैसा कि देवों को वादा दिया गया था।


औषधीय पर्वत के टुकडे

माना जाता है कि औषधीय पर्वत [संजीवनी पार्वत], जो अपने मूल स्थान से लाया गया है, उस समय यह कई स्थानों पर टुकड़ों और भागो में गिर गया था। यह दावा किया जाता है कि ऐसा ही एक टुकड़ा वर्तमान आंध्र और तमिलनाडु की सीमा में गिरा था। वर्तमान में इस स्थान को अरगोंडा के नाम से जाना जाता है। तेलुगु में अरगोड़ा का अर्थ है आधी पहाड़ी, संस्कृत में इसे अर्धगिरी के नाम से जाना जाता है। यह स्थान आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले के तवानम पल्ली मंडल में स्थित है। प्रसिद्ध कानिपाक्कम विनायक मंदिर सिर्फ दस किलो मीटर की दूरी पर है।


संजीव राय पुष्करिणी

संजीव राय पुष्करिणी, अरगोड़ा,  चित्तूर आंध्र प्रदेश

जगह की सुरम्य दृष्टि मंत्रमुग्ध कर देने वाली है, जिसमें औषधीय पहाड़ दृश्य की पृष्ठभूमि बनाते हैं। कम से कम दो या तीन पहाड़ हैं जो संजीव औषधीय पर्वत का समूह बनाते हैं। इनमें से सबसे ऊंचाई में छोटा को मुख्य अरगोंडा माना जाता है। पहाड़ की चोटी पर एक तालाब है जिसे संजीवराय पुष्करिणी के नाम से जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि तालाब हमेशा भरा रहता है और कभी सूखता नहीं है।


ऐसा माना जाता है कि इस पुष्करणी के पानी का संजीवनी पर्वत की जड़ी-बूटियों के रूप में बहुत अधिक औषधीय महत्व है, और यहां तक कि टीबी आदि जैसे रोग भी ठीक हो जाते हैं। इस मामले में चार महीने बाद भी इस पुष्करिणी का पानी खराब नहीं हुआ है।


श्री वीर अंजनेय स्वामी मंदिर

मुख्य पर्वत लगभग 300 फीट ऊँचा है। इस क्षेत्र में एक छोटा मंदिर काफी लंबे समय से अस्तित्व में था, कहा जाता है कि यह 300 साल पहले से था। आज मंदिर में सुधार देखा गया था। अब भी मंदिर काफी छोटा है और पवित्रता बनाए रखता है। हालांकि यहां का मुख्य आकर्षण पुष्करिणी और श्री वीरा अंजनेय है, हनुमान मंदिर पहुंचने से ठीक पहले विनायक के लिए एक छोटा मंदिर है। थोडे दिन हुए, अय्यप्पा के लिए एक मंदिर भी हनुमान मंदिर के सामने वाली पहाड़ी पर बनाया गया है।


श्री वीर अंजनेय स्वामि (हनुमान)

मुख्य गर्भगृह में उत्तर की ओर लंगोट पहने हुए श्री वीरा हनुमान स्वामी विराजमान है। लगभग तीन फीट की मूर्ति तांबे की प्लेट से ढकी हुई है। मुख्य देवता का अवतार स्पष्ट रूप से देखा जाता है। उनके दाहिने हाथ अभय मुद्रा में दिखाई दे रहा है, बाएं हाथ में वे शौगंधिका फूल पकड़े हुए हैं। उनकी पूंछ को सिर के ऊपर उठा हुआ देखा गया है और लगभग 300-400 साल पुरानी आंध्र की हनुमान मूर्तियों की एक छोटी घंटी है। वह सुंदर कुंडल (कान की बाली) पहने हुए दिखाई देते है, एक सजावटी माला उनकी गर्दन सजाती है। उनकी आंखों में चमक देखी जाती है।


त्यौहार और सेवा

सुबह साढ़े पांच बजे से लेकर रात के नौ बजे तक मंदिर खुला रहता है। भक्तों को पचास / साठ के जत्था में अनुमति दी जाती है और पूजा आयोजित की जाती है। पवित्र जल और तुलसी को प्रसाद के रूप में दिया जाता है। एक बार जब वह जत्था खत्म हो जाता है तो भक्तों के अगले जत्थे को अनुमति दी जाती है। भक्त फूलों और पान का पत्ता से बनी माला चढ़ाते हैं। पूर्णिमा के दिन मंदिर रात में ग्यारह बजे तक खुला रहता है, इस दिन भक्तों की भारी भीड़ होती है।


कैसे पहुंचे

चित्तूर और कनीपाक्कम से अरगोड़ा के लिए सीधी बसें हैं। आप तमिलनाडु के वेल्लोर से चित्तूर पहुँच सकते हैं। एक बार जब आप अरगोड़ा पहाड़ियों के नीचे हैं, तो आप या तो उस पहाड़ी पर चल कर जा सकते हैं जो तीस मिनट तक का समय ले सकता है या पहाड़ी के ऊपर-नीचे ऑटो ले जा सकता है। पहाड़ी की चोटी पर फूल, माला, ठंडे पेयँ, कॉफी या चाय बेचने वाली कुछ दुकानें हैं।

अनुभव
भगवान संजीवराय की कृपा हम सभी को स्वस्थ और दीर्घायु प्रदान करती है।


रेफ: वर्धमान द्वारा प्रकाशित कम्बा रामायणम और मंदिर के पुजारी।


प्रकाशन [मार्च 2019]

 


तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

 


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