श्री मुख्य प्राण [हनुमान] मंदिर
हनुमंतरायन कोविल स्ट्रीट, तिरूवल्लिकेनी, चेन्नई, तमिल नाडु

बी नागराजन

 

श्री मुख्य प्राण मंदिर का अभिषेक
कुछ साल पहले तक, हनुमंतरायन कोविल स्ट्रीट, त्रिपलीकेन जोकि तिरूवल्लिकेनी चेन्नई माधवा ब्राह्मणों के लिए एक गढ़ है और उसे अग्राहरम नाम से भी जाना जाता है। श्री श्री सथ्यसंधारू (1783-1794), श्री उत्तराधी मठ के पच्चीसवें पंडित (श्री माधवाचार्य के बाद) ने 1794 में अग्राहरम में, सात फुट से नौ फुट की श्री मुख्यप्राण (जगद्गुरु) की मूर्ति के समक्ष, माधवों के लाभ के लिए ज्ञान दिया था। मंदिर से सटे लोगों द्वारा अतिरिक्त जगह के उदार भेंट के साथ, अब वहाँ घने घरों की आबादी तथा परिक्रमा के चारों ओर पथ पर दो फुट ही जगह है।


विग्रह की विशेषताएँ
उन्नीस इंच ऊँची मूर्ति, ठोस स्फटिक पत्थर से बनी, जिसमें दांया पैर एक इंच बांये पैर से आगे निकला हुआ है। छाती के पास हाथ जोड़कर कंगन और आभूष्णों से सुज्जित, लंगोट पहने हुये, बायें कंधे से और उपरी बायें भुजा पर गदा टिकी हुई, कानो में कुंडल पहने हुये, एक छोटा मुकुट सिर पर शोभायमान, जोकि विनम्रता, दासता, ब्रह्मचर्य, त्याग, अच्छे चरित्र को दर्शाता है, भगवान की आदर्श आकृति जिस पर ध्यान करतें हैं।


मनुष्यों के लिये हाथ जोड़ना लाचारी प्रकट करता है और व्यक्त करता है कि वो कुछ भी नहीं हासिल कर सकते हैं। जबकि भगवान सब कुछ कर सकते हैं। प्रभु अकेले ही पर्याप्त सुरक्षा दे सकते हैं, असीम स्नेह के साथ संतप्त (परेशान) आत्माओं का स्वागत करके अपने में विलीन कर लेतें हैं।


1910 में मंदिर का नवीकरण
आगामी वर्षों में वहाँ मंदिर को बनाये रखने का कोई अभिलेख नहीं था। जनता के द्वारा संरक्षण बढ़ाया, फिर भी चुप रहे। श्री उत्तरधि मठ के श्री श्री सथ्यज्नना थीर्थरू (वंश में ३७वें) एक स्थानीय माधवा पर्यवेक्षक (श्री सथ्यनन्दा रामचर) को इस छोटे से मंदिर के जीर्णोद्धार एवं देख-रेख के लिए निर्देश दिया। नवीकरण के बाद, सम्प्रोकोहन 1910 में परमपावन द्वारा किया गया था।


श्री राम संस्था तथा मंदिर के कार्य
फिर 1976 में, श्री राम संस्था (स्थापित 1943) द्वारा मंदिर को एक नया रूप देने के लिये पूरा खर्चा उठाया। यह संस्था श्री रामनवमी महोत्सव वार्षिक मनाती है नौ दिन की अवधि के दौरान तमिलनाडु के बाहर से बहुश्रुत और प्रतिष्ठित विद्वानों द्वारा प्रवचन, तदोपरान्त भजन (दसरपदस) भी शामिल होता है। श्री रामनवमी दिन गरीब लड़को के लिये धर्मोपनयनम भी कराया जाता है। इसके अलावा, श्री राम के चित्र का एक भव्य जुलूस प्रसिद्ध श्री पार्थसारथी स्वामी मंदिर के चारों तरफ की सड़कों से निकाला जाता है। श्री रामनवमी के अतिरिक्त, नवरात्री, हनुमान जयंती, अक्षय तृतीया आदि दिनों में, लोग बड़ी संख्या में एकत्रित होकर अपनी सेवाएँ प्रदान करतें हैं।


कुंभाभिषेकम
पुराना गुंबद, जोकि गर्भगृह की छत से टपक रहा था और मोर्टार की धूल भी गिर रही थी को नीचे खींच लिया था और तेरह फीट ऊंचाई का एक नया गुंबद, सभी पक्षों के आदर-सत्कार और परंपरा के अनुसार, बहुरंगीय मूर्तियों के साथ उठाया गया था। मंदिर का फर्श तथा दिवारें ठोस स्फटिक पत्थर से बनाई गई थीं। इस पुनर्निर्मित मंदिर के अष्टबंदन कुंभाभिषेकम, पूर्व संस्कार के आचरण के बाद, अगमा शास्त्र के अनुसार, 23.01.2000 को श्री उत्तरधि मठ के श्री श्री सथ्यात्म थीर्थरू (वंश में 42वें) की अध्यक्षता में किया गया था। इस प्रक्रिया के दौरान गर्भगृह के अंदर का भाग अछूता छोड़ दिया था, जोकि इसकी प्राचीनता की याद दिलाता है।


आस-पास से भक्त लोग, रोजाना इस मंदिर के दर्शन और पुजा-अर्चना करने के लिये आते हैं। हर कोई आपस में मंदिर के साथ हुये अपने-अपने अनुभव बतातें हैं। मुख्यप्राण जीवन का निर्वाहक है। जो कोई इस मंदिर की भीड़ में भी ध्यान लगाता है, वो अपने आपको गर्वित महसुस करता है, और उसका जीर्णोद्धार हो जाता है।



|| मुख्या प्राणातंर्गत सितापति श्री रामचन्द्रा प्रियतमा ||



अनुभव
इस मंदिर में शाम के समय दर्शन करें और मुख्यप्राण की उपस्थिति में ध्यान पर बैठें, यह बिताया हुआ समय आपको हमेशा स्मरण रहेगा।

 

 

 

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

 

ed : march 2015