श्री संकट मोचन हनुमान मंदिर, राजापुर, चित्रकूट, उतर प्रदेश

जी के कोशिक

 

 

राजापुर
श्री तुलसीदास का जन्म स्थान, राजापुर, चित्रकूट, उतर प्रदेश
श्री हनुमान भक्तों के लिये राजापुर जाना पहचाना स्थान है, यह आधुनिक समय के महान संत का जन्म स्थान है। संत श्री तुलसीदासजी ने, यहाँ आम आदमी की भाषा अवधी में श्री रामायण महाकाव्य की रचना की थी। हांलाकि वो संस्क्रत भाषा के विद्वान थे, फिर भी आम आदमी को अवधी भाषा में बोलने के लिये, उन्होंने श्री रामायण महाकाव्य अवधी भाषा में लिखा। महान ज्ञानी संत ने दोबारा श्री रामायण लिखी और उसका नाम श्री राम चरित मानस रखा था। उन्होंने मानस की रचना में श्री शिव के द्वारा श्री रामचंद्र की कहानी को प्रतिपादित किया। और इस प्रकार श्री शिव और श्री विष्णु पंथ के अनुयायियों के बीच एकता लाये। उस समय यह एक क्रांतिकारी कार्य था, जोकि सनातन धर्म अनुयायियों के बीच एकता लाने के लिए बहुत आवश्यक था। इन महान संत का जन्म गांव राजापुर वर्तमान जिला चित्रकूट, उतर प्रदेश में हुआ था। यह सुंदर गांव यमुना नदी के किनारे बसा हुआ है। यह दिलचस्प बात है कि इस जगह को छूने तथा पवित्र बनाने के लिए, यमुना नदी दाईनें मुड़ती है। श्री तुलसीदास ने एक प्रतिष्ठित सरयूपारीण ब्राह्मण आत्माराम दुबे के यहाँ जन्म लिया। और उनकी माता का नाम हुलसी था। जन्म के समय बालक तुलसीदास रोये नहीं, अपितु उनके मुख से राम का शब्द निकला, इसीलिये वो रामबोला कहलाये गये।


रामबोला ने राजापुर छोड़ा
अभुक्तमुल नक्षत्र के तहत पैदा हुआ बालक, ज्योतिष (हिन्दू ज्योतिष) के अनुसार पिता के जीवन को तत्काल खतरे का कारण बनता है। तथा उनके जन्म के समय अशुभ घटनाओं के कारण, उन्हें चौथी रात को, उनकी माता ने अपनी दासी चुनियाँ के साथ, दूर भेज दिया। चुनियाँ बालक को अपने साथ हरिपुर गाँव ले आई। जहाँ लगभग साढ़े पाँच वर्ष तक बड़े प्रेम से बालक का पालन-पोषण किया और उसके बाद चुनियाँ का देहान्त हो गया। रामबोला अनाथ हो गया और भीख मांग कर गुजारा करने के लिये द्वार-द्वार भट्कने लगा।


तुलसी का राजापुर में फिर से आना
बाद में नरहरिदास ने रामबोला को अपनाया था, रामानंद के मठवासी आदेश पर एक वैष्णव तपस्वी जोकि रामानंद का चौथा शिष्य होने के लिए, रामबोला को विरक्त दिक्षा दी तथा उनका नया नाम तुलसीदास रख दिया। तुलसीदास को सनातन धर्म के विभिन्न पहलुओं पर उचित शिक्षा दी गई। कुछ साल बाद उन्होंने अपने गुरु से संत वाल्मीकि की श्रीमद रामायण की कथा की दीक्षा ली। फिर उसके बाद के समय से कई लोगों के लिए, तुलसीदास रामायण प्रवचन के एक प्रतिपादक के रूप में जाने जाते थे।

श्री राम चरित मानस पाण्डुलिपि भवन, राजापुर, चित्रकूट, उतर प्रदेश
जैसा कि राजापुर गाँव का खराव समय चल रहा था, राजापुर गाँव के लोगो ने तुलसीदासजी से अनुग्रह किया, ये बिना जानते हुये कि वो उनका ही रामबोला है। शुभ दिन पर उन्होंने गांव के लिये प्रस्थान किया। गांव के बुजुर्गों ने उनका स्वागत किया और व्यवस्थानुसार तुलसीदासजी ने अपने गांव में रामायण पर प्रवचन दिया। श्री तुलसीदास के आगमन और श्रीमद रामायण के प्रवचन के बाद, राजापुर के लोग ने अपनी परिस्थितियों में भारी परिवर्तन पाया। बारिशें नियमित हो रहीं थीं, फसलों का उत्पादन ज्यादा हो गया था। राजापुर गाँव के लोग खुशहाल और धनवान हो गये थे। तब उन्हें एहसास हुआ कि वो राजापुर गाँव में ही पैदा हुये थे।


श्री तुलसीदासजी और नन्दी श्री हनुमान
राजापुर में अपने प्रवास के दौरान, एक दिन तुलसीदास ने पास के श्री हनुमान मंदिर नन्दी गाँव पर ध्यान लगाया। वो इस मंदिर में अक्सर जाते और वहाँ श्री हनुमान जी के मंदिर में ध्यान साधना करते थे। समानतय नन्दी का मतलब खुशी, संतुष्टि, और आनन्द है।

एक बार नदी में बाढ़ आ गई और तुलसीदासजी का नन्दी गाँव जाना न हो सका। उन्होंने बाढ़ आई नदी के तट पर बैठकर, नन्दी गाँव के श्री हनुमान पर ध्यान साधना की। उन्हें नन्दी गाँव के हनुमानजी से दिव्य निर्देश मिला कि राजापुर में उनके द्वारा तैयार चंदन पेस्ट में अपने आप उपस्तिथ हो जायेगें।


मंत्रारूप श्री हनुमान राजापुर
हनुमानजी के निर्देशानुसार, तुलसीदास ने चंन्द्न का पेस्ट बनाया और उसमें देवता की प्राण प्रदिष्टा की। मंत्रारूप में देवता की स्थापना के बाद, उन्होंने अपने पैतृक गांव राजापुर में श्री हनुमानजी की पूजा शुरू कर दी।

इसके कुछ समय बाद, वो तीर्थ यात्रा पर संगम, वाराणसी इत्यादि को रवाना हो गये थे ।


राजापुर के संकटमोचन श्री हनुमान
राजापुर में आज श्री तुल्सीदास द्वारा स्थापित देवता को ही श्री संकट मोचन हनुमान के नाम से जाना जाता है। अभी हाल में ही मंदिर का पुनर्निर्मिण हुआ है। हाँलाकी मंदिर यमुना नदी के किनारे पर स्थित है, पर श्री तुलसीदासजी के जन्म स्थान तुलसीघाट से दूर है। राजापुर बस स्टैन्ड से दो किलोमीटर की दूरी पर, मेन बाजार से होते हुये यमुना नदी को जाने वाले रास्ते पर, श्री संकट मोचन हनुमान मंदिर है। जैसे ही हम मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैं, दाहिने तरफ श्री राम, सीता और लक्ष्मण की धर्मस्थल [सन्नति] है। ये धर्मस्थल [सन्नति] श्री संकट मोचन हनुमान के मुख्य गर्भगृह के सामने है।

श्री संकट मोचन हनुमान मंदिर, राजापुर, चित्रकूट, उतर प्रदेश
संत श्री सरभंग तपस्या कर रहे थे और श्री राम के वनवास के दौरान, दर्शन पाने का इंतज़ार कर रहे थे। श्री राम भक्तों का विशवास विफल नहीं करते और वो संत श्री शरभंग के आश्रम गये जोकि चित्रकूट के पास है। संत श्री शरभंग ने अपने आश्रम में श्री राम के साथ भाई लक्ष्मण और श्री सीता का स्वागत किया। श्री राम परिवार के अतिथि-सत्कार के बाद, उन्होंने कहा कि अब उनका इस दुनिया में इंतजार समाप्त हुआ और ये कहकर चिताग्नि में प्रवेश किया :-


सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम ।
मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरूप श्री राम ॥


हे नीले मेघ के समान श्याम शरीरवाले सगुणरूप श्रीरामजी ! सीताजी और छोटे भाई लक्ष्मण सहित प्रभु मेरे ह्रदय में निवास कीजिये ॥

इस जगह श्री राम परिवार वैसा ही दिखता है जैसा कि संत श्री शरभंग ने देखा था। आईये हम श्री हनुमानजी के दर्शन करने के लिए आगे बढ़ने से पहले, श्री हनुमानजी के मुख्य देवता श्री रामजी के दर्शन कर लें।


श्री संकटमोचन हनुमान
श्री संकटमोचन हनुमान के दर्शन पाने के लिये आपको कुछ सीढ़ीयाँ चढ़नी है, इस क्षैत्र के श्री हनुमान नन्दी गाँव के श्री हनुमान जैसे दिखते हैं। श्री संकट मोचन हनुमान हमेशा श्री रामचन्द्रजी को देख रहे हैं। यहां ऐसा लगता है कि श्री हनुमानजी श्री राम से मिलने वाले आशीर्वादों को अपने भक्तों पर निछावर कर देतें हैं। इस पवित्र स्थान पर पुजा करें और श्री रामचन्द्रजी एवं श्री हनुमानजी से आशीर्वाद पायें।



आईये इस क्षैत्र के श्री हनुमानजी के दर्शन करके, हम पुनर्जन्म से मुक्ति तथा सभी संकटों से छुटकारा पायें॥


 

 

 

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥