बड़े हनुमानजी मंदिर [पुराना] अलीगंज, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

स्व.पंडित देव राज त्रिपाठी, दिल्ली और श्री शिवनाथ, लखनऊ

 

लखनऊ अलीगंज में दो हनुमान मंदिर - पुराना हनुमान मंदिर

लखनऊ
लखनऊ भारत के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी है। शहर गंगा की एक सहायक नदी गोमती के दोनों किनारों पर फैला हुआ है। इसकी पुरानी जीवन शैली भव्यता, आतिथ्य और समृद्ध संस्कृति के लिए जानी जाती है, लेकिन लगता है कि विचारोत्तेजक जीवन शैली लंबे समय से ही खत्म हो चुकी है। जो कुछ बचा है, वो अभी भी लोगों के व्यवहार और आदतों में पाया जाता है। लखनऊ अवध के नवाबों का निवास स्थान था, और उनके सुख इत्यादि के लिये शाही लीलायें प्रसिद्ध थीं। वे अपने औपचारिक भाषण परिष्कृत गीत और नृत्य के शौकीन थे। अवध के नवाबों ने उर्दू कविता को महत्ता दी, साथ ही साथ कथक स्कूल के सभ्य नृत्यों को प्रोत्साहित किया। उन्होंने स्मारकों में मेहराब, मंडप और गुंबदों के उपयोग में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। लखनऊ भी अपने महान आतिथ्य के साथ जुड़ा हुआ है, जीवन की मनोदशा, कल्पित कहानियाँ तथा ऊँची हवेलियाँ इतिहास में क्षीण हो गई हैं। समय के झटकों के बावजूद लखनऊ ने अपनी सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं को नहीं खोया है, जिसने एक बार अपने समय में अतुलनीय शहर बनने में योगदान किया था।


लखनऊ-लक्ष्मणपुरी बड़े हनुमानजी, अलीगंज, लखनऊ
अवध के नवाबों से बहुत पहले, लखनऊ शहर लक्ष्मणपुरी के नाम से जाना जाता था। यह नाम अयोध्या के प्रभु श्री राम के भाई लक्ष्मण के नाम पर रखा गया था। इस महान शहर में नवाबों द्वारा निर्मित भगवान हनुमान के लिए एक शानदार छोटा सा मंदिर है। यहाँ आज भी सभी धर्मों के लोग प्रार्थना अर्पित करनें के लिये आतें हैं। यह मंदिर शहर के छोर पर अलीगंज में स्थित है। वास्तव में अलीगंज में हनुमान के लिए दो मंदिर हैं। यहाँ विशेष रूप से बड़े मंगल को बहुत श्रद्धालुजन दर्शन करने के लिए आतें हैं।


दिव्य चरित्र.

श्री राम सेवक की दिव्य परख

भगवान राम को एक दर्दनाक एवं कठोर निर्णय लेना पड़ा था। एक नागरिक के संदेहवंश, भगवान राम ने सीता माता को त्यागने का निर्णय लिया था। लेकिन भगवान राम ने राजधर्म के अनुसार यह फैसला लिया कि सीता माता को जंगल भेज दिया जाये। श्री राम ने अपने भाई श्री लक्ष्मण तथा श्री हनुमानजी को बुलाया और अपने फैसले के बारे में उन्हें बताया तथा उन दोनों को सीता माता को जंगल में छोड़ने का कठिन कार्यभार सोंपा। उन दोनों ने महसूस किया कि जैसे उन पर स्वर्ग टुट पड़ा हो, तब भी भगवान राम पर अत्यंत विश्वास था कि वो अपने प्रभु की इच्छा की अवज्ञा नहीं कर सकते थे।


श्री सीता माता और हनुमानजी
श्री लक्ष्मण और श्री हनुमान ने सीता माता को जंगल में पहुंचाया। तीनों ने अयोध्या की राजधानी को छोड़ दिया और जंगल की ओर चल दिये। ऋषि माधव्या का आश्रम नदी गोमती के तट पर था। आश्रम के पास बहुत सारे तालाबों में कमल के फुल खिले थे जिससे वहाँ का वातावरण निर्मल और शांत था। जब तीनों ऋषि माधव्या के आश्रम के पास पहुँचे, सुर्य ढूब रहा था श्री लक्ष्मण की राय थी कि वो रात को आश्रम में विश्राम करें और अगले दिन आगे बढ़े। लेकिन सीता माता ने इसके विपरीत कामना की थी। परंपरा के अनुसार नदी को पार करने का मतलब था जैसेकि उस राज्य-क्षेत्र को पार कर लिया हो। इसलिए सीता माता ने कामना की थी कि वो पास की गोमती नदी को पार कर लें। इससे वो अयोध्या के राज्य-क्षेत्र को छोड़ देगीं और भगवान राम की इच्छाओं का भी पालन हो जाएगा। तब यह निर्णय लिया गया कि लक्ष्मण आश्रम में ही अपनी शाम की पूजा करेगें तथा श्री हनुमान और सीता माता से गोमती नदी के दूसरी तरफ शामिेल होगें। श्री हनुमान ने सीता माता को गोमती नदी के दूसरे तट पर सुरक्षित पहुंचाया। श्री हनुमान ने अनुरोध किया कि सीता माता सहज हो जायें और सीता माता जी की रक्षा के लिये श्री हनुमान रात भर जागे। श्री लक्ष्मण गोमती नदी के दूसरी तरफ न आ सके, और रात भर नदी के अयोध्या की तरफ ही रूकना पड़ा। इ्सीलिए श्री हनुमान ने गोमती नदी के तट पर सीता माता की रक्षा रात भर जागते हुये की थी।


बड़े हनुमानजी
बड़े हनुमानजी मंदिर [पुराना] अलीगंज, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
श्री हनुमान के संरक्षण में जिस स्थान पर गोमती नदी के तट पर सीता माता ने रात के लिए विश्राम किया था उसे बड़े हनुमानजी के नाम से जाना जाता था। वहीं कुछ समय बाद भगवान हनुमान के भक्तों ने प्रभु के लिए एक छोटे से मंदिर का निर्माण किया। यह वर्तमान अलीगंज का ही लोकप्रिय पुराना बड़े हनुमानजी का मंदिर है। चौदहव सदी के दौरान इस जगह का नाम, शासकों ने 'हनुमान बाड़ी’ से 'इस्लाम बाड़ी’ रख दिया था। नवाबों के शासनकाल में पुराने हनुमान मंदिर के प्रशासन को शासकों ने ले लिया था। इस समय के दौरान इस मंदिर ने अयोध्या की बड़ी छावनी के साथ एक रिश्ता बनाया था। बेगम आलिया की शादी छत्रकुंवर परिवार में संपन्न हुई थी जोकि इस मंदिर के भगवान हनुमान का भक्त और अनुयायी था। बेगम आलिया नियमित रूप से मंदिर में दर्शनार्थ जातीं थी तथा उसी अवधि में, मंदिर के जीर्णोद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने मंदिर के जीर्णोद्धार के दौरान ही वहाँ एक बड़ा टैंक भी बनवाया था।


बड़े हनुमानजी का अंलकार (भूषण)
वर्ष 1783 के दौरान एक मारवाड़ी व्यापारी लक्ष्मणपुरी में केसर और कस्तूरी, व्यापार के लिए साथ लाया था। उसने अपनी वस्तुओं को बेचने के लिए लक्ष्मणपुरी में और आसपास के कई स्थानों का दौरा किया । आम तौर पर केसर और कस्तूरी का पूजा में उपयोग किया जाता है। इसलिए उसने अपने माल को बेचने के लिए कई पूजा-स्थलों का दौरा किया। दो-तीन के लंबे दिनों के बाद भी वो अपनी सामग्री किसी को नहीं बेच सका था। वह थक गया और चकित था कि ऐसी सामग्री लक्ष्मणपुरी की तरह एक धनी जगह में भी नहीं बेचा जा सका था। सूर्यास्त होने जा रहा था और व्यापारी ने स्नानोपरान्त पास के मंदिर का दौरा किया। व्यापारी ने शांतीपूर्ण हनुमानजी के दर्शन किये और भगवान की पूजा-अर्चना की। व्यापारी ने भगवान से कुछ करने के लिए प्रार्थना की, ताकि उसका सारा माल बिक जाये और मारवाड़ में अपने परिवार से मिलने के लिए, वापस जा सके। वो पास की धर्मशाला में रात भर विश्राम के लिये रूका। उसी समय सुहानी हवाएँ बहनी शुरू हुई और धर्मशाला में उसके द्वारा संग्रहीत केसर और कस्तूरी की खुशबू हल्के हवा के साथ काफी दूर तक चली गई। नवाब वाजिद अली शाह और उनकी बेगम शाम के समय टहल रहे थे उन्होनें केसर-कस्तूरी की खुशबू को अनूठा पाया, और तुरंत ही डिप्टी को बुलाकर कहा कि यह पता लगाओ कि खुशबू कहां से आ रही है। खोजने पर मारवाड़ी व्यापारी का पता लगा, जोकि धर्मशाला में आराम कर रहा था। तदोपरान्त व्यापारी को नवाब और बेगम के समक्ष पेश किया गया। बेगम ने सारा केसर और कस्तूरी, व्यापारी से अच्छी कीमत देकर खरीदा लिया।

व्यापारी इस लेन-देन से बहुत खुश था तथा वह इतनी जल्दी संताप मुक्त हो जाने से भगवान का बहुत आभारी था। फिर वह प्रभु के पास गया और उनकी पूजा-अर्चना की। उसने बाद में, मंदिर के लिए कई चीजें प्रदान की। हमें कहना चाहिए कि प्रभु, भगवान हनुमान के इलावा कोई अन्य नहीं है। और मंदिर अलीगंज का पुराना हनुमान मंदिर है। मंदिर के जीर्णोद्धार के बाद, मंदिर की मीनार पर अर्धचंद्र और सितारा बेगम की कालावधि में स्थापित किया गया था जिसका लिखित प्रमाण मौजुद है। बेगम भगवान हनुमान को इतना समर्पित थीं कि बेगम ने अपने बेटे शहदाद अली खान का नाम मंगलू रखा था।

मंदिर छोटा है, तथा हनुमानजी की मूर्ति भी छोटी है, लेकिन ऐसा विश्वास किया जाता है कि बड़े हनुमानजी, बड़े अच्छे रक्षक और आश्रयदाता हैं, जोकि अपने भक्तों के आस-पास की सभी बुराइयों से रक्षा करतें हैं।


 

 

 

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥