श्री हनुमान मंदिर, तपोवन, झारखंड

श्री नागराज, नोयडा

 

 

बारह ज्योर्ति लिंग
तपोवन के श्री हनुमान,  झारखंड
हमने अपने पहले लेखों में बारह ज्योर्ति लिंग में सबसे पहला - श्री सोमनाथ और कष्ट निवारण - श्री हनुमान के बारे में पढ़ा। भगवान बैद्यनाथ की एक और ज्योर्ति लिंग देओघर झारखंड में स्थित है।


"वैद्यनाधाम चिताभुउमैओ नागेशम दारुकावने" उस स्थान के बारे में बतलाता है, जहाँ वैद्यनाथधाम स्थित है - जंगलों में जहाँ नागों के देवता श्मशान भूमि में रहते हैं।

बासुकीनाथ शिव मंदिर
प्राचीन बासुकीनाथ शिव मंदिर, बैद्यनाथ मंदिर से तेतालिस किलोमीटर दूर पर स्थित है। बैद्यनाथ मंदिर के दर्शन, बासुकीनाथ शिव मंदिर के बिना अभिवादन के अधूरे माने जाते हैं। यहाँ पार्वती जी और भगवान शिव के लिये अलग-अलग मंदिर हैं, और वो आमने-सामने हैं। बासुकी नाम के एक शिकारी को यह शिव लिंग इस जगह शिकार पर जाते हुए मिली। इस कथा का दुसरा वर्णन ये भी है कि समुद्र-मंथन के पश्चात, बासुकी साँप ने इस स्थान को आराम करने के लिये चुना।


बैद्यनाथ मंदिर
बैद्यनाथ मंदिर,  झारखंड
लंका का राजा रावण भगवान शिव के दर्शनो के लिए, कैलाश पर्वत को अक्सर जाया करता था। उसने श्री शिव से आत्मालिंग लेना चाहा, जिससे उसे केलास पर्वत जाने की जरुरत न पड़े। इस उद्देश्य की प्राप्ती के लिए रावण ने भगवान शिव पर ध्यान साधना की और अंतत: शिव रावण से खुश हुए, और उसे अपने साथ आत्मालिंग ले जाने की अनुमति दे दी। इसी के साथ शिव ने लिंग को रास्ते में जमीन पर न रखने की सलाह दी। देवता भी आत्मालिंग को रावण के लंका ले जाने से प्रसन्न न थे और भगवान विष्णु से यह रोकने के लिए कुछ करने का अनुरोध किया। कैलाश पर्वत से लंका जाते हुए, रावण की संध्यावंदना का समय हो गया। संध्यावंदना अंतराल के लिये रावण ने किसी को ढूढ़ा जो शिव लिंग को लेकर बैठ जाये। उसी समय भगवान विष्णु एक चरवाहा बनकर आ गये, यह न जानते हुए, रावण ने आत्मालिंग रखने के लिये अनुरोध किया। विष्णु ने, रावण की वापसी में देरी होने के कारण, झगड़े होने का नाटकीय ढ़्ग से देवघर में आत्मालिंग जमीन पर रख दिया। रावण ने इसे उखाड़ने के लिये, अपने सर्वोतम प्रयास किये, लेकिन सब असफल रहे। दूसरी ओर, लिंग जमीन में गहराई तक रोपित हो गया और केवल लिंग को सतह तक देखा जा सकता था। गहरे पश्चाताप के बाद, रावण शिवलिंग की पूजा एवं गंगाजल चढ़ाने के लिए इस जगह हर रोज आने लगा।


तपोवन
तपोवन के श्री हनुमान,  झारखंड
बैद्यनाथ के पास दस किलोमीटर की दूरी पर, पहाड़ो के समुहों को तपोवन कहतें हैं। बैद्यनाथ की तरह यह स्थान भी रामायण से जुड़ा हुआ है। तपोवन नाम परिचायक है कि जहाँ संतों और साधुओं ने आत्मज्ञान प्राप्ति के लिये तपस्या की हो। ऋषि वाल्मीकि उन संतों में से एक है, जिन्होंने इस पुण्य भूमि में तपस्या की थी। वहां पहाड़ियों में कई गुफायें हैं जहाँ कई संतों ने तपस्या की थी। अभी हाल ही में, ऐसे ही एक संत श्री बालनंदा ब्रह्मचारी ने इस जगह पर सिद्धि प्राप्त की है। वहाँ तपोनाथ महादेव नाम से एक शिव मंदिर है।


तपोवन के श्री हनुमान
इस पहाड़ी पर कई गुफायें पाई जाती हैं। इन्हीं पहाड़ियों में से एक में, हनुमान जी का एक अनोखा मंदिर है। हनुमान मंदिर तक पहुंचने के लिए गहरी और खोखली गुफाओं के मध्य से जाना पड़ता है। वहाँ दो विशाल चट्टानें क्षितिज के समातंर दिशा में स्थित हैं, दोनों चट्टानो के बीच एक संकीर्ण खुला भाग भी है, और एक चट्टान में दरार है। दरार इतनी संकीर्ण है, कि उनके बीच में हाथ रखना मुशकिल है। यह अद्भुत है, कि दरार के दोनों सतहों पर उत्कीर्ण शिल्पकारी दवारा भगवान हनुमान अंकित हैं। जब तक व्यक्ति स्वयं देख न ले तब तक इसके अस्तित्व को मानना मुमकिन नहीं, और न ही उत्कीर्ण शिल्पकारी की कल्पना कर सकते हैं।


अनुभव
एक व्यक्ति के लिए यह शिल्पकारी लगभग असंभव है। माना जाता है जैसा कि ये इन देवताओं ने ही स्वयं उभारी हों।      जय श्री हनुमान॥


 

 

 

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥