श्री संकट मोचन हनुमान का श्री दुधाधारी मंदिर, रायपुर, छ्तीसगढ़

श्री सुब्रामनया स्वामी

 

 

छ्तीसगढ़
जहां छ्तीस किले हों उसे छ्तीसगढ़ कहते हैं। यह मध्यप्रदेश का ही एक हिस्सा है। छ्तीसगढ़ राज्य की स्थापना १ नवंबर २००० को हुई और रायपुर को राजधानी बनाया गया। हालांकि ये आम धारणा है कि वहां छ्तीस किले हैं, पर वहां अड़तालिस किले हैं। यह इतिहास में कोशल का हिस्सा रहा और मौर्या राजाओं के आधीन था। हैह्या राजाओं ने भी यहां शासन किया। छ्तीसगढ़ का नाम पुराने इतिहास में कहीं नहीं मिलता है। हो सकता है, कि ये छेदीशगढ़ का ही बिगड़ा हुआ रुप हो। जिसका मतलब प्रभु छेदी का किला है।


रायपुर
रायपुर शहर हैह्या राजाओं की राजधानी था जोकि छ्तीसगढ़ किलों पर अधिकारिस्त थे। यहां आज भी पुराने खंडहर देखे जा सकतें हैं जोकि रायपुर शहर के दक्षिण में स्थित हैं। यह विशवास किया जाता है कि राजा रामाचन्द्र कलचुढ़ी वंशपरंपरा के ने ही शहर बनाया और रायपुर उनके पुत्र ब्रह्मदेव राय के नाम पर पड़ा और तदुपरान्त उनके पुत्र ने इसे अपने राज्य की राजधानी बनाया। वहां इतिहासकारों का मत है कि ब्रह्मदेव राय ने ही अपने नाम पर इस शहर की स्थापना की और अपनी राजधानी खालवातिका (खल्लारी) को स्थानान्तरित कर दिया। इस शहर ने अपनी पारम्परिक प्रतिष्ठा कभी नहीं खोई, जब बिट्रिश राज में, ये केन्द्रीय प्रदेश था तथा स्वाधीनता के बाद मध्य प्रदेश में। आज रायपुर ने एक अलग राज्य की राजधानी के रुप में अपनी खोई ख्याति प्राप्त कर ली है।


रायपुर में मंदिर
हालांकि आज रायपुर में काफी मंदिर हैं। उनमें से कुछ सम्मानित हैं, जगन्नाथ्म. महामाया, विवेकानन्द आश्रम, दुधाधारी मंदिर, दुधाधारी मठ, बालाजी मंदिर, संकटमोचन हनुमान, राम पंचायत और वीर हनुमान मंदिर। इनमें से बाद के छ: मंदिर ही प्राचीन और दुधाधारी मठ से जुड़े हुए हैं।


दुधाधारी नाम श्री संकट मोचन हनुमान का श्री दुधाधारी मंदिर, रायपुर, छ्तीसगढ़
वहां मंह्त स्वामी बालभद्र दास रहते थे, जोकि भगवान हनुमान के उत्क्रष्ट भक्त थे। वे स्वंभू हनुमान की पुजा करते थे। वे हनुमान जी को दुध का भोग लगाते थे तथा वही दुध खुद पीते थे। किव्दंति के अनुसार, एक सुरही नाम की गाय रोजाना मंह्त जी के पास आती थी, और अपना दुध भगवान हनुमान जी के लिये देती थी। कुछ समय बाद, मंह्त स्वामी बालभद्र दास जी केवल दुध पर रहने लगे, और इसीलिये इनको दुधाधारी नाम से जाना जाने लगा था।


श्री बालाजी मंदिर
मंह्त स्वामी बालभद्र दासजी के काफ़ी अनुयायी थे उनके समय में श्री रघु राओ जी भोसलें जोकि नागपुर के शासक थे और रायपुर उनके आधीनस्थ था। वो भी मंह्त स्वामी बालभद्र दास जी के अनुयायी थे राजा भगवान विष्नु के भक्त थे और वो श्री बालाजी का मन्दिर रायपुर में बनाना चाहते थे। उन्होंने अपनी इच्छा मंह्त जी को बताई और मंह्त जी की सलाह पर ये सुनिशचित हुआ कि मन्दिर दुधाधारी मठ के पास बनाया जाए। श्री बालाजी का एक बहुत अच्छा मन्दिर जहां मंह्त स्वामी बालभद्र दासजी रहते थे के पास १६१० ईस्वी में बनकर तेयार हुआ। यहाँ दिवारें श्री राम के जीवन की छांकियों से सुशोभित हैं। आज भी हम उन छांकियों का अवलोकन कर सकते हैं। वहां अब कुछ सालिगराम ही हैं, जोकि पुजा स्थल पर स्थापित हैं।


संकट मोचन हनुमान
श्री बालाजी मन्दिर बनने के कुछ दिनों बाद ही, जहां मंह्त दुधाधारी संनथी हनुमान की पुजा करते थे, के पीछे एक चमत्कार हुआ । श्री हनुमान जोकि पूजनीय रामभक्त हैं ने अपना मुख श्री बालाजी की तरफ घुमाया, जबकि उनका शरीर उसी तरह रहा । इसीलिये यह मन्दिर अनोखा है क्योंकि मन्दिर का दरवाजा और सीढ़ीयां एक दिशा में नहीं हैं जैसाकि और मन्दिरों में होता है । दरवाजे दक्षिण की तरफ श्री बालाजी को देखते हुये और सीढ़ीयॉ उतर की तरफ़ हैं । आज भी प्राचीन अनोखे हनु्मान जी उसी तरह खड़े हुये देखे जा सकते हैं । इसी मन्दिर में स्वामी दुधाधारी हनुमान जी की पुजा करतें थे और उनका नाम संकट मोचन हनुमान रखा क्योंकि हनुमान जी अपने भक्तों को हर संभव कठिनाईयों से छुटकारा दिलातें हैं ।


श्री रामपंचायत, श्री दुधाधारी मंदिर, रायपुर, छ्तीसगढ़श्री रामपंचायत, श्री दुधाधारी मंदिर, रायपुर, छ्तीसगढ़
श्री बालाजी मन्दिर बनने के बीस साल बाद, वहीं साथ में श्री जगन्नाथ सेव ने एक अत्यंत सुन्दर श्री राम परिवार मन्दिर की स्थापना की । आदि में श्री राम, सीता मां, भरत,लक्ष्मण एवं शत्रुगन, की मूर्तियां लकडी की बनाकर लगाई गईं । श्री राम परिवार के पांच सदस्य होने की वजह से इस मन्दिर का नाम श्री रामपंचायत रखा गया । सन १९२२ में मन्दिर का जीर्णोधार हुआ और लकडी मूर्तियां की जगह संगमरमर की मूर्तियां स्थापित हुईं । यहां ध्यान देने की बात है कि श्री राम एवं भरत जी की मूर्तियां काले संगमरमर की हैं । मन्दिर की दिवारों पर सुन्दर नक्काशी से रामायण और महाभारत गंर्थो की कथाएं दर्शा हुई हैं ।


वीर ह्नुमान
श्री हनुमान जी के बिना श्री राम परिवार अपूर्ण है। एक छोटा से मंदिर में हनुमान जी को वीर ह्नुमान दर्शाया गया है जोकि रामपंचायत मन्दिर के सामने बना हुआ है। वीर हनुमान जी अपने बायें हाथ में संजीवनी पर्वत एवं दायें हाथ में गदा लिये हुये हैं, राम-रावण युध के बाद, वो अहीरावण का अपने पैरों से वध करते हुए दर्शाये गये हैं।


श्री दुधाधारी का वृन्दावन
मंह्त स्वामी बालभद्र दासजी ने अपना सारा जीवन भगवान हनुमान की पुजा में स्मर्पित किया और रायपुर में श्री बालाजी मन्दिर की स्थापना में प्रधान भुमिका निभाई। उन्होनें सिर्फ दुध पीकर अपना निर्वाह किया तथा राजा एवं लोगों के साथ एक जैसा वर्ताव किया, उनको आर्शीवाद दिया एवं कठिनाईयों कम की। वो हमें संकट मोचन हनुमान का खजाना देकर चले गये । हांलाकि वो अपनी देह छोड्कर चले गये, परन्तु फिर भी ऐसा विशवास किया जाता है कि उनके एवं संकट मोचन हनुमान जी के आर्शीवाद से कोई भी व्यक्ति आसानी से मुशकिलों एवं दिक्कतों से छुटकारा पा लेता है। जिस जगह उन्होंने इस संसार को छोड़ा उस जग़ह को वृन्दावन के नाम से जाना जाता है। आज भी मंह्त जी का आर्शीवाद प्राप्त करने के लिये भक्तगण वृन्दावन आते हैं। आज भी जो सामान मंहत जी प्रयोग में लाते थे, वो वृन्दावन के पास ही रखे हुए हैं।


मंह्त श्री दुधाधारी और उनको बनाने वाले श्री संकटमोचन हनुमान अपनी शक्ति से, हमें कठिनाईयों और दुखों से छुटकारा दिलाने के लिये, हमारा इंतजार कर रहें हैं। आईये, ह्म उनका आर्शीवाद प्राप्त करने के लिये, वहां जरूर जायें।


 

 

 

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥